सरोज कुमार गुप्ता/सीतामढ़ी। ​नेपाल के राजनीतिक गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आई है जहां सुधन गुरुङ ने अपने पद से इस्तीफा देने के 49 दिन बाद गृह मंत्री के रूप में पुनः वापसी की है। प्रधानमंत्री बालेन शाह द्वारा उन्हें एक बार फिर इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए चुना गया है। गुरुङ का यह पुनः पदभार ग्रहण करना नेपाल की वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता और शक्ति संतुलन के बीच एक बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।

​जांच समिति से मिली क्लीन चिट

​सुधन गुरुङ का राजनीतिक सफर तब रुका था जब उन पर संपत्ति विवाद को लेकर गंभीर आरोप लगे थे। इसके बाद, पूर्व न्यायाधीश अच्युतम प्रसाद भंडारी की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। इस समिति ने 45 पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें गुरुङ को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। समिति के अनुसार, गुरुङ द्वारा अर्जित संपत्ति पूरी तरह से वैध है और सोना उनके पैतृक अधिकार का हिस्सा है। वहीं, जमीन के मामले में सरकारी प्रणालियों की तकनीकी खामियों को जिम्मेदार ठहराया गया। साथ ही, विवादास्पद व्यवसायी दीपक भट्ट के साथ उनके किसी भी प्रकार के व्यावसायिक संबंध के सबूत नहीं मिले।

​विवाद का संक्षिप्त इतिहास

​याद दिला दें कि 2 अप्रैल 2026 को व्यवसायी दीपक भट्ट की मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तारी के बाद सुधन गुरुङ का नाम विवादों के केंद्र में आ गया था। राजनीतिक दबाव के कारण उन्होंने 22 अप्रैल 2026 को गृह मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय का घटनाक्रम नेपाल की सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था।

​अभी भी बरकरार हैं कुछ सवाल

​हालांकि सुधन गुरुङ को जांच समिति ने तो दोषमुक्त कर दिया है, लेकिन नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ नेपाल (NHRC) की एक पूर्व रिपोर्ट अभी भी उनके राजनीतिक भविष्य पर छाया बनकर मंडरा रही है। 10 सितंबर 2025 की एक घटना को लेकर आयोग ने गुरुङ की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक जन-आंदोलन को प्रभावित करने का प्रयास किया था और अराजक गतिविधियों को बढ़ावा दिया था।
​अब जब गुरुङ दोबारा गृह मंत्री पद की शपथ ले रहे हैं तो देखना यह होगा कि वे विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों के उन पुराने सवालों का सामना कैसे करते हैं। नेपाल की राजनीति में उनकी यह वापसी सरकार की स्थिरता को मजबूत करती है या नए विवादों को जन्म देती है यह आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल काठमांडू के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है।