कर्नाटक की सुलागिट्टी नरसम्मा ने बिना किसी औपचारिक शिक्षा या मेडिकल डिग्री के अपने जीवनकाल में 15,000 से अधिक सफल और सुरक्षित प्रसव करवाकर इतिहास रच दिया।
हरियाणा। आज जब प्रसव के लिए आधुनिक अस्पताल, एम्बुलेंस और प्रशिक्षित डॉक्टर आसानी से उपलब्ध हैं, तब शायद यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि एक समय ऐसा था, जब दूर-दराज़ के गांवों में हजारों माताओं और नवजात शिशुओं की जिंदगी एक ऐसी महिला के भरोसे थी, जिसने कभी स्कूल की चौखट तक नहीं देखी थी। यह कहानी है कर्नाटक की सुलागिट्टी नरसम्मा की, जिन्होंने बिना किसी मेडिकल डिग्री के करीब 15 हजार बच्चों की सुरक्षित डिलीवरी कराकर सेवा, समर्पण और मानवता की ऐसी मिसाल कायम की, जिसे देश ने अंततः पद्मश्री से सम्मानित किया।
साल 1920 में कर्नाटक के तुमकुरु जिले के कृष्णापुरा गांव में जन्मी नरसम्मा बेहद साधारण परिवार से थीं। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण वे कभी स्कूल नहीं जा सकीं। महज 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हो गया और उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियां संभाल लीं। लेकिन जीवन ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। समुदाय की बुजुर्ग महिलाओं से उन्होंने पारंपरिक प्रसव विधियां, जड़ी-बूटियों का ज्ञान और गर्भवती महिलाओं की देखभाल के तरीके सीखे। धीरे-धीरे उनका अनुभव इतना गहरा हो गया कि लोग कहते थे, वे बिना किसी आधुनिक उपकरण के ही गर्भ में पल रहे बच्चे की स्थिति का सटीक अंदाजा लगा लेती थीं।

करीब 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार एक महिला के प्रसव में मदद की। इसके बाद उनका यह सफर कभी नहीं रुका। जब भी किसी गांव में किसी महिला को प्रसव पीड़ा होती, लोग सबसे पहले नरसम्मा को बुलाने दौड़ पड़ते। आधी रात हो, मूसलाधार बारिश हो या तपती दोपहर, उन्होंने कभी किसी जरूरतमंद को निराश नहीं किया। अगले सात दशकों तक वे हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी किरण बनी रहीं। उस दौर में जब गांवों में अस्पताल और डॉक्टरों की पहुंच बेहद सीमित थी, नरसम्मा ने अपने अनुभव और धैर्य के बल पर हजारों माताओं और नवजात शिशुओं को सुरक्षित जीवन दिया।
नरसम्मा की सबसे बड़ी पहचान यह रही कि उन्होंने अपनी सेवा को कभी कमाई का जरिया नहीं बनाया। करीब 70 वर्षों तक उन्होंने बिना किसी फीस की मांग किए जरूरतमंद महिलाओं की मदद की। उनके हाथों जन्म लेने वाले बच्चे बड़े हुए, परिवार बसाए और फिर अपने बच्चों के जन्म के समय भी उसी भरोसे के साथ नरसम्मा को बुलाया। यही वजह थी कि लोग उन्हें सिर्फ एक दाई नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की ‘मां’ कहकर सम्मान देते थे।
दशकों तक चुपचाप सेवा करने वाली इस महिला के योगदान को आखिरकार देश ने भी पहचाना। उन्हें पहले मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया गया और फिर साल 2018 में भारत सरकार ने पद्मश्री देकर उनके अद्भुत योगदान को राष्ट्रीय सम्मान दिया। यह सम्मान सिर्फ नरसम्मा का नहीं, बल्कि उन अनगिनत ग्रामीण महिलाओं की सेवा भावना का भी सम्मान था, जिन्होंने बिना किसी पहचान की चाह के समाज के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
25 दिसंबर 2018 को 98 वर्ष की आयु में फेफड़ों की बीमारी के कारण नरसम्मा का निधन हो गया। उनके अंतिम दर्शन के लिए हजारों लोग उमड़े और उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। आज भी कर्नाटक के गांवों में सुलागिट्टी नरसम्मा का नाम सेवा, ममता और मानवता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनकी कहानी बताती है कि महान बनने के लिए बड़ी डिग्री नहीं, बल्कि बड़ा दिल और दूसरों के लिए जीने का जज्बा चाहिए।

