Supreme Court Hearing On OBC Creamy Layer Reservation: ओबीसी क्रीमी लेयर आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करेगा। ओबीसी क्रीमी लेयर पर शीर्ष न्यायालय में सुनवाई थोड़ी देर में शुरू होगी। वहीं सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से सिर्फ माता-पिता की सैलरी-आय पर फैसला नहीं देने की अपील की है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से CSE-2025 के 958 चयनित उम्मीदवारों की सर्विस अलोकेशन प्रक्रिया पुराने OBC क्रीमी लेयर मानदंड के आधार पर करने की अनुमति मांगी है।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में 11 मार्च को OBC क्रीमी लेयर की पहचान को लेकर फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र 8 सितंबर 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) को नहीं बदल सकता।
इससे पहले सुनवाई करे दौरान मोदी सरकार ने ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में 11 मार्च को दिए आदेश में बदलाव की मांग की थी। सरकार का कहना है 11 मार्च के आदेश का OBC पर बुरा असर पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जरूरी दिशा-निर्देश भी मांगा था। सरकार ने कहा- सिर्फ माता-पिता की सैलरी या आय के आधार पर किसी उम्मीदवार को OBC क्रीमी लेयर में शामिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद की स्थिति के साथ आय और संपत्ति को भी देखना जरूरी है। वहीं सीजेआई सूर्यकांत ने केंद्र सरकार को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था।
केंद्र की दलील- पुराने नियम के तहत परीक्षा दी
केंद्र ने कहा कि CSE-2025 की परीक्षा 11 मार्च के फैसले से पहले शुरू हो गई थी। नोटिफिकेशन 22 जनवरी 2025 को आया था। प्रीलिम्स 25 मई और मेन्स 22 से 31 अगस्त 2025 तक हुई। 6 मार्च 2026 को 958 उम्मीदवारों का रिजल्ट आया। इसके पांच दिन बाद 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला आया। केंद्र के मुताबिक, अगर नया फैसला पिछली तारीख से लागू हुआ तो उन उम्मीदवारों के साथ भेदभाव हो सकता है, जिन्होंने पुराने नियमों के आधार पर परीक्षा दी थी।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर तय करने के लिए सिर्फ माता-पिता की वेतन आय को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पीएसयू, बैंक या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के वेतन को आधार मानकर बच्चों को केवल इसलिए आरक्षण के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनकी सैलरी तय सीमा से अधिक है। मामले में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने माना था कि इस तरह का भेद करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
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