सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मुद्दे समेत धर्म बनाम कानून के मामले पर बहस जारी है. इस मामले में 9 जजों की बड़ी बेंच सुनवाई कर रही है, जिसमें छठें दिन भी बहस जारी रही. इस दौरान धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराएं, आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच बैलेंस पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठे. कोर्ट ने पूछा, ‘मूर्ति छूना ईश्वर का अपमान कैसे हो सकता है और वे अपवित्र कैसे हो जाते हैं.’ सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, ‘क्या संविधान उस भक्त की मदद के लिए आगे नहीं आएगा, जिसे केवल उसके वंश और जन्म के कारण देवता को छूने से रोक दिया जाता है.’
इस पर सबरीमाला के वकील एडवोकेट वी. गिरी ने कहा किसी भी मंदिर में होने वाले रीति-रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं. पूजा देवता की विशेषताओं के उलट नहीं हो सकती. भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं, इसलिए वहां की परंपराएं उसी के अनुरूप तय की गई हैं.
पूजा का अधिकार व्यक्ति की आस्था से जुड़ा
सीनियर एडवोकेट गिरी ने दलील दी कि आर्टिकल-25 के तहत पूजा का अधिकार व्यक्ति की आस्था से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि किसी मंदिर, मस्जिद या चर्च में जाने का अधिकार व्यक्ति के विश्वास का हिस्सा है. वकील गिरी ने कहा कि पूजा करना हर व्यक्ति का अधिकार है.जो व्यक्ति किसी भगवान में विश्वास करता है, उसे हर बार मंदिर जाकर यह समझने की जरूरत नहीं कि वहां पूजा कैसे होती है. उसकी आस्था उसके साथ रहती है—चाहे वह मंदिर जाए, मस्जिद जाए या चर्च. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति मंदिर ही नहीं जाता, तो उसके ‘एंट्री के अधिकार’ को हर स्थिति में अनुच्छेद 25 के तहत नहीं माना जा सकता.
‘क्या भगवान अपवित्र हो सकते हैं?’
उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर में ‘अर्चक’ (पुजारी) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. यदि किसी अन्य संप्रदाय का अर्चक मूर्ति को स्पर्श करता है, जिसे आगम परंपरा मान्यता नहीं देती, तो यह श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंचा सकता है. ऐसे में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप धार्मिक मान्यताओं में दखल माना जाएगा. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि केवल जन्म के आधार पर किसी को पुजारी बनने से रोकना पूरी तरह अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं है.
कल आ सकता है फैसला
सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक बेंच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है. इसके साथ धार्मिक आस्था के 66 मामले और जुड़े हैं. फैसला कल आने की संभावना है.
केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया. फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है. मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है.
सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है. पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई. इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं. सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए.
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