भिवानी: हरियाणा के भिवानी जिले का रोहनत गांव आज भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की उन दर्दनाक यादों को संजोए हुए है, जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत ग्रामीणों को अपने खून से चुकानी पड़ी थी। जिस गांव में कभी अंग्रेजों ने विद्रोह कुचलने के लिए तोपें दागीं, ग्रामीणों पर बर्बर कार्रवाई की और जमीनें नीलाम कर दीं, वहां आजादी के 71 साल बाद पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।
रोहनत 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने वाले प्रमुख गांवों में शामिल था। ग्रामीणों ने ब्रिटिश शासन का विरोध करते हुए स्थानीय हथियारों के साथ अंग्रेजी सैनिकों का मुकाबला किया। इसके बाद अंग्रेजों ने गांव के खिलाफ बेहद कठोर कार्रवाई की।
तोपों से किया गया गांव पर हमला
इतिहास से जुड़ी जानकारी के अनुसार, अंग्रेजी सैनिकों ने रोहनत और आसपास के इलाके में तोपों से हमला किया। इस कार्रवाई में बड़ी संख्या में ग्रामीणों के मारे जाने की बात सामने आती है। ग्रामीणों के मुताबिक, अंग्रेजों ने बचे हुए लोगों को भी नहीं बख्शा। कई लोगों को कथित तौर पर सड़क रोलर से कुचल दिया गया। इसी घटना से जुड़ी सड़क को आज भी ‘लाल सड़क’ के नाम से जाना जाता है।
बताया जाता है कि अंग्रेजों ने गांव के लोगों के लिए पानी के स्रोतों तक पहुंच रोक दी थी। कुएं को मिट्टी से बंद कर दिया गया और इसके बाद कई ग्रामीणों को फांसी दिए जाने की भी जानकारी मिलती है। गांव के वीरदास बैरागी को तोप से बांधकर उड़ा दिए जाने की कहानी भी रोहनत के इतिहास का हिस्सा है।
अंग्रेजों के सामने माफी मांगने से किया इनकार
अंग्रेजों की कार्रवाई यहीं नहीं रुकी। विद्रोह के बाद गांव की जमीनों को नीलाम कर दिया गया। ग्रामीणों पर अंग्रेजी हुकूमत के सामने माफी मांगने का दबाव बनाया गया, लेकिन ग्रामीणों ने झुकने से इनकार कर दिया। इसके बाद उनकी जमीनें नीलाम कर दी गईं।
ग्रामीणों का कहना है कि उस समय की कार्रवाई का असर आज तक दिखाई देता है और जमीन से जुड़े अधिकारों का मुद्दा अभी भी गांव के लोगों के लिए बड़ा सवाल बना हुआ है।
71 साल बाद गांव में पहली बार फहरा तिरंगा
देश को आजादी मिलने के बाद भी रोहनत के लोगों के लिए तिरंगा फहराने का सपना लंबे समय तक अधूरा रहा। 23 मार्च 2018 को आजादी के 71 साल बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर रोहनत गांव पहुंचे और वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
इस मौके पर गांव के इतिहास और बलिदान को सम्मान देने के लिए कई विकास कार्यों की घोषणा और शुरुआत की गई। गांव में वेबसाइट, पुस्तकालय, व्यायामशाला और गौरव पट जैसी सुविधाएं विकसित की गईं। सरकार की ओर से ग्रामीणों की जमीन से जुड़ी समस्याओं के समाधान का भरोसा भी दिया गया था।
हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि उनकी कई मांगें अब तक पूरी नहीं हुई हैं। उनका यह भी कहना है कि तिरंगा फहराने की परंपरा अब मुख्य रूप से गांव के स्कूलों तक सीमित रह गई है। ऐसे में रोहनत की कहानी आज भी सिर्फ 1857 के बलिदान की कहानी नहीं है, बल्कि उन ग्रामीणों के संघर्ष की कहानी भी है, जो पीढ़ियों बाद भी अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
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