US React On India FCRA Amendment Bill: भारत के प्रस्तावित ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट यानी एफआरसीए (FCRA) संशोधन बिल को लेकर अमेरिका में बवाल खड़ा हो गया है। India FCRA Amendments Bill को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सांसद राइली मूर (Riley Moore) को मिर्ची लग गई है। रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने बिल को ईसाई धर्म पर सीधा हमला करार देते हुए कहा कि इससे द्विपक्षीय रिश्तों पर असर पड़ेगा। राइली मूर ने चेतावनी दी कि यह भारत-अमेरिका संबंधों में विवाद का मुद्दा बन सकता है। जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि बदलावों का मकसद विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर नियंत्रण करने की अनुमति दे सकता है। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब संसद के चल रहे मानसून सत्र के दौरान ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026’ पर तीखी बहस हो रही है।
ट्रंप के सांसद ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा- भारत में ईसाई समुदाय तब से रह रहा है, जब सेंट थॉमस द एपोस्टल यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद मालाबार तट आए थे। हालांकि इस लंबे इतिहास के बावजूद भारत की संसद FCRA बिल के नियमों में ऐसे संशोधन करने पर विचार कर रही है। इससे सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटीज का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की छूट मिल सके। उन्होंने लिखा-यह ईसाइयों पर सीधा हमला है। अगर यह बिल पास हुआ तो भारत और अमेरिका के संबंध चिंता जनक स्थिति में पहुंच सकते हैं।
क्या है फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट-2010
केंद्र सरकार ने मानसून सत्र के दौरान फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट, 2010 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। यह कानून तय करता है कि गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), धार्मिक संस्थान, शैक्षणिक संस्थान और चैरिटेबल ट्रस्ट विदेशी चंदा कैसे जुटाते हैं और इसका कैसे इस्तेमाल करते हैं। मौजूदा नियमों के मुताबिक इसके लिए गृह मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है। बिल के साथ दिए गए बैकग्राउंड नोट के अनुसार, 15 जुलाई 2026 तक भारत में 14,449 सक्रिय FCRA पंजीकरण थे। इसके अलावा 22,498 पंजीकरण रद्द कर दिए गए थे। जबकि 15,212 की समय-सीमा समाप्त हो गई थी। 2019 और 2022 के बीच, इस अधिनियम के तहत पंजीकृत संगठनों को 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा प्राप्त हुआ।

बिल पर क्यों हो रहा विवाद
विपक्षी पार्टियां, NGO और कई सिविल सोसाइटी ग्रुप का तर्क है कि इन संशोधनों से केंद्र सरकार को विदेशी फंडिंग पर निर्भर संगठनों पर बहुत ज्यादा कंट्रोल मिल जाएगा। चर्च और धार्मिक संगठन इस वजह से भी चिंतित हैं कि अगर उनका रजिस्ट्रेशन पांच साल बाद एक्सपायर होता है और रीन्यू नहीं होता है तो उनके द्वारा बनाए गए स्कूल या हॉस्पिटल सरकार के नियंत्रण में आ सकते हैं। ये चिंताएं खास तौर पर केरल और मिजोरम में ज्यादा हैं। दोनों राज्यों में कई ईसाई संगठन बड़े शैक्षणिक और स्वास्थ्य सेवा संस्थान चलाते हैं जो लंबे समय से विदेशी योगदान पर निर्भर रहे हैं।
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