सतीश सिंह, लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में विपक्ष के हंगामे के कारण संभल हिंसा पर गठित न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट सदन में चर्चा का विषय नहीं बन सकी. सरकार ने रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा, जिसमें हिंसा को पूर्व नियोजित बताया गया है. रिपोर्ट में समाजवादी पार्टी के नेताओं और समर्थकों पर हिंसा भड़काने के आरोप हैं. रिपोर्ट में 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हुई हिंसा को पूर्व नियोजित साजिश बताया गया है.
संभल हिंसा की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय आयोग ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपी थी. आयोग में पूर्व डीजीपी अरविंद कुमार जैन और पूर्व आईएएस अधिकारी अमित मोहन प्रसाद सदस्य थे. आयोग का गठन नवंबर-दिसंबर 2024 में किया गया था.
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आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, जामा मस्जिद के सदर जफर अली, सचिव महशूद अली फारूकी, जामा मस्जिद इंतेजामिया कमेटी के अन्य सदस्यों तथा स्थानीय विधायक इकबाल महमूद के पुत्र एवं प्रतिनिधि सुहेल इकबाल की भूमिका का उल्लेख किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन लोगों ने अदालत के आदेश पर हो रहे एएसआई सर्वे का विरोध करने के लिए साजिश रची और मुस्लिम समुदाय से मस्जिद पर एकत्र होकर सर्वे का विरोध करने का आह्वान किया.
रिपोर्ट के अनुसार अदालत के आदेश की वास्तविक प्रकृति और सर्वे का उद्देश्य जानबूझकर लोगों से छिपाया गया. आम लोगों के बीच यह संदेश फैलाया गया कि जामा मस्जिद के अस्तित्व पर खतरा है, जबकि अदालत ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था. आयोग ने कहा कि मुकदमे में केवल एएसआई संरक्षित स्मारक के रखरखाव और आम लोगों के प्रवेश से जुड़े निर्देश मांगे गए थे.
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आयोग का निष्कर्ष है कि 19 नवंबर 2024 को हुए पहले सर्वे और 24 नवंबर की घटना के बीच स्थानीय राजनीतिक हस्तियों और जामा मस्जिद कमेटी के सदस्यों को भीड़ जुटाने का पर्याप्त समय मिला. रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनीतिक वर्चस्व और मस्जिद पर नियंत्रण बनाए रखने की मंशा से भीड़ को सुनियोजित तरीके से उकसाया गया.
रिपोर्ट के मुताबिक भीड़ ने जामा मस्जिद में प्रवेश करने का प्रयास किया और “नारा-ए-तकबीर”, “अल्लाह-हु-अकबर” और “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा” जैसे नारे लगाए. इसके बाद हिंसा, पथराव और उपद्रव की घटनाएं हुईं. आयोग ने कहा कि किसी भी नागरिक को अदालत की प्रक्रिया बाधित करने या कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायालय के आदेशों का पालन न करना, भीड़ के बल पर सर्वे रोकने का प्रयास करना, अदालत में लंबित वाद को गलत तरीके से प्रस्तुत करना और भ्रामक जानकारी फैलाना संविधान की भावना के विपरीत है. आयोग ने कहा कि ऐसा आचरण भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और अन्य प्रासंगिक कानूनों के तहत दंडनीय है और इसे राष्ट्रविरोधी कृत्य की श्रेणी में माना जाना चाहिए.
आयोग ने स्पष्ट कहा है कि अदालत के आदेश के अनुसार होने वाले सर्वे से जामा मस्जिद के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं था. रिपोर्ट में उल्लेख है कि जामा मस्जिद वर्ष 1920 से एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है और वर्ष 1927 के पंजीकृत समझौते के तहत भी यह आम जनता के लिए खुली रही है. ऐसे में सर्वे का विरोध करने का कोई कानूनी आधार नहीं था.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि घटना का उद्देश्य केवल सर्वे रोकना नहीं था, बल्कि उसे सांप्रदायिक रंग देकर सरकार और उसकी मशीनरी को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना भी था. आयोग ने कहा कि बड़ी संख्या में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भीड़ में शामिल थे और कई लोगों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए मास्क पहन रखे थे.
आयोग ने सरकार से सिफारिश की है कि इस तरह की सुनियोजित हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए. रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि ऐसे अपराध सिद्ध होते हैं तो दोषियों को कठोर दंड, आवश्यकता पड़ने पर आजीवन कारावास तक दिया जाना चाहिए. साथ ही अदालत के आदेशों के सम्मान, कानून के शासन और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रभावी कदम उठाने की भी सिफारिश की गई है.


