सतीश सिंह, लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र हंगामे के बीच समय से पहले एक दिन पूर्व समाप्त होने के बाद विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय मर्यादा पर बड़ा संदेश जारी किया है. बिना किसी दल का नाम लिए उन्होंने कहा कि संविधान में कोई कमी नहीं है, कमी उन लोगों में है जो उसका पालन करते हैं. उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के संविधान सभा में दिए गए कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने इस बात को फिर साबित कर दिया है.
सतीश महाना ने कहा कि पिछले साढ़े चार वर्षों में उनका प्रयास विधानसभा की गरिमा, मर्यादा और संवैधानिक महत्व को मजबूत करने का रहा है. इसी सोच के तहत उन्होंने पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्यों की शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता का विवरण सार्वजनिक कराया, ताकि यह संदेश जाए कि विधायिका में डॉक्टर, इंजीनियर, एमबीए, विधि विशेषज्ञ और विभिन्न क्षेत्रों के उच्च शिक्षित प्रतिनिधि मौजूद हैं. उनका कहना था कि इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा.
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विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि केवल उच्च शिक्षा या योग्यता पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनप्रतिनिधियों का आचरण भी उसी स्तर का होना चाहिए. उन्होंने कहा कि यदि सदन में चुने गए सदस्य संसदीय परंपराओं और मर्यादाओं का पालन नहीं करेंगे तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे. उन्होंने कहा कि वाद-विवाद, मतभेद और विरोध लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन भाषा और व्यवहार की मर्यादा हर हाल में बनी रहनी चाहिए. संसदीय आचरण की सीमा लांघना लोकतंत्र और विधायिका, दोनों के लिए नुकसानदायक है.
सतीश महाना ने कहा कि विधानसभा के नेता और प्रदेश के मुख्यमंत्री का सम्मान करना सभी विधायकों का संवैधानिक दायित्व है. उन्होंने याद दिलाया कि विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणी का विरोध किया था, क्योंकि किसी भी मुख्यमंत्री का सम्मान व्यक्ति नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्था का सम्मान होता है. उन्होंने कहा कि विधायक जब शपथ लेते हैं तो उसमें संवैधानिक संस्थाओं और सदन की गरिमा बनाए रखने की भावना भी शामिल होती है. यदि सदस्य स्वयं सदन के नेता का सम्मान नहीं करेंगे तो विधायिका की प्रतिष्ठा कमजोर होगी.
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विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि मानसून सत्र के दौरान एक सदस्य का आचरण बेहद निराशाजनक रहा. उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा कि जिस सदस्य को सदन का “रोल मॉडल” माना जाता था, उसके व्यवहार से उन्हें गहरा दुख पहुंचा. यह पहली बार था जब उन्हें लगा कि या तो उनके प्रयासों में कहीं कमी रह गई या फिर डॉ. आंबेडकर की बात सही साबित हो रही है कि समस्या संविधान में नहीं, बल्कि उसका पालन करने वाले लोगों में है.
महाना ने कहा कि यदि उच्च शिक्षित और अनुभवी जनप्रतिनिधि भी संसदीय मर्यादा का पालन नहीं करेंगे तो आने वाले समय में विधायिका की उपयोगिता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। उन्होंने सभी दलों के विधायकों से आग्रह किया कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और सदन की प्रतिष्ठा को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए.


