रविंद्र कुमार भारद्वाज, रायबरेली. ऊंचाहार इलाका आज सिसकियों और आक्रोश से गूंज उठा है. रक्षक जब भक्षक बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? बीकरगढ़ गांव में 24 वर्षीय राजू यादव की आत्महत्या ने योगी सरकार के ‘रामराज्य’ के दावों की पोल खोलकर रख दी है. महज तीन महीने पहले जिस घर में शहनाइयां गूंजी थीं, वहां अब मातम का सन्नाटा है. आरोप सीधा और संगीन है कि पुलिस की प्रताड़ना और गीदड़भभकी ने एक हंसते-खेलते नौजवान को मौत के फंदे तक पहुंचा दिया.

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यह मामला महज एक आत्महत्या नहीं, बल्कि खाकी के अहंकार द्वारा की गई ‘सिस्टमैटिक हत्या’ है. परिजनों का कलेजा फट रहा है, उनका कहना है कि पुलिस ने राजू का जीना मुहाल कर रखा था. दबिश के नाम पर घर की मर्यादा तार-तार की गई. सवाल यह है कि क्या अब पुलिस का काम सुरक्षा देना नहीं, बल्कि निर्दोषों को डराकर उन्हें मौत बांटना रह गया है? इस घटना ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज कर दी है. यह कैबिनेट मंत्री डॉ. मनोज कुमार पांडे का निर्वाचन क्षेत्र है, लेकिन यहां कानून का नहीं, बल्कि खौफ का राज दिख रहा है.

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समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष इंजीनियर वीरेंद्र यादव ने घटनास्थल पर पहुंचकर सरकार को ललकारा है. उन्होंने दो टूक कहा, “यह पुलिसिया गुंडागर्दी की पराकाष्ठा है. खाकी अब अपराधियों के आगे नतमस्तक है और आम जनता का गला घोंट रही है. हम इस ‘वर्दीधारी हत्यारों’ को सजा दिलाए बिना चैन से नहीं बैठेंगे. आखिर कब तक वर्दी की आड़ में निर्दोषों की बलि चढ़ती रहेगी? क्या सरकार के पास उन आंसुओं का कोई हिसाब है, जो एक विधवा की आंखों से बह रहे हैं?