आसानी से प्राप्त समृद्धि और ख्याति उतनी ही शीघ्रता और आसानी से समाप्त भी हो जाती है इसे ही “Easy come, easy go” कहते हैं। यह दर्शन आर्थिक और समाजिकि दृष्टि से सत्य तो सत्य है ही इसका जीवन पर भी गहरा प्रभाव देखा गया है। सच्चाई यह है कि मनुष्य बिना परिश्रम के किसी विराट का भी स्वामी हो जाए फिर भी वह उसके मूल्य को समझ नहीं पाता। नतीजा वही होता है जिसकी आशंका होती है यानी वह धन, वह अवसर, वह सफलता, वह समृद्धि और वह प्रतिष्ठा लंबे समय तक टिक नहीं पाती।
मेहनत से अर्जित यश,धन और सफलता में मूल्य, अनुभव और अनुशासन का निचोड़ होता है।उदाहरण के तौर पर हम धन को ही लें जब हम परिश्रम करते हैं तो हम उस अर्जित धन के उपयोग में सावधानी बरतते हैं। और दूसरी तरफ अचानक मिला हुआ धन, लॉटरी, विरासत या भाग्यवश पाई पूंजी अक्सर व्यक्ति को असावधानी और दिखावे की ओर ले जाता है।
भारतीय ग्रंथों में भी कर्म और परिश्रम को श्रेष्ठ माना गया है। रामचरितमानस की चौपाई “कर्म प्रधान विश्व करि राखा…” यह स्पष्ट करती है कि जीवन में स्थायी सफलता कर्म के आधार पर ही सम्भव है और बिना श्रम के प्राप्त फल कभी स्थायी नहीं होते।
अनायास मिलने वाली आसान सफलता व्यक्ति को चरित्र से कमजोर बनाती है। संघर्ष से दूर भागना उसकी प्रवृत्ति बन जाती है और वो धीरे-धीरे अपनी आत्मनिर्भरता खो देता है। इसके उलट कठिन परिश्रम से मिली उपलब्धि आत्मविश्वास और संतोष दोनों देती है। उचित यह है कि त्वरित लाभ के बजाय स्थायी सफलता पर ध्यान देना चाहिए। परिश्रम, धैर्य और ईमानदारी ही सच्ची और टिकाऊ समृद्धि की ओर ले जाने वाला अकेला रास्ता है। संक्षेप में कहें तो जो वस्तु या वैभव आसानी से मिलता है वह टिकता नही और जो मेहनत से मिलता है वह जीवन भर छूटता नही ।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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