हेमंत शर्मा, इंदौर। आमतौर पर जनप्रतिनिधियों को मंचों पर भाषण देते, अधिकारियों के साथ बैठक करते या सरकारी योजनाओं का प्रचार करते देखा जाता है। लेकिन इंदौर में एक जनप्रतिनिधि ने योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए ऐसा रास्ता चुना, जिसने लोगों को सोचने और भावुक होने पर मजबूर कर दिया।इंदौर नगर निगम के वार्ड क्रमांक 64 के पार्षद और एमआईसी सदस्य मनीष शर्मा, जिनके पास शहरी गरीबी उपशमन विभाग की जिम्मेदारी है, कभी फटे-पुराने कपड़े पहनकर हाथ में कटोरा लिए सड़क पर नजर आए तो कभी फल विक्रेता बनकर लोगों के बीच बैठे। मकसद सिर्फ इतना था कि जिन लोगों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी कागजों और दफ्तरों के रास्ते नहीं पहुंच पाती, उन्हें उसी जगह जाकर योजनाओं का रास्ता समझाया जाए जहां वे अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

जब जिम्मेदारी ने बदला रूप… हाथ में कटोरा लेकर सड़क पर उतरे मनीष शर्मा

फटे कपड़े, बिखरा हुआ हुलिया और हाथ में कटोरा… पहली नजर में कोई भी उन्हें भिक्षुक समझ सकता था। लेकिन इस रूप के पीछे एक जनप्रतिनिधि का संदेश छिपा था।भिक्षावृत्ति के लिए मजबूर लोगों के बीच पहुंचकर मनीष शर्मा ने यह बताने की कोशिश की कि सड़क पर हाथ फैलाना किसी व्यक्ति की पहली पसंद नहीं होता। कई बार परिस्थितियां इंसान को उस मोड़ पर ला खड़ा करती हैं, जहां उसके सामने रोज दो वक्त की रोटी का सवाल सबसे बड़ा हो जाता है।इसी मजबूरी को समझने और भिक्षुक पुनर्वास की योजनाओं की जानकारी देने के लिए उन्होंने खुद वही रूप धारण किया, जिसे समाज अक्सर नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाता है।

‘कटोरा नहीं, हाथ में हुनर चाहिए’… दिया सम्मान से जीने का संदेश

इस पूरे प्रयास का सबसे मार्मिक पहलू यही रहा कि भिक्षुक के रूप में सड़क पर उतरकर मनीष शर्मा ने सिर्फ योजना की जानकारी नहीं दी, बल्कि समाज के सामने एक सवाल भी रखा—क्या किसी जरूरतमंद को हमेशा मदद के लिए हाथ फैलाने की स्थिति में रहना चाहिए, या उसे अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिलना चाहिए?

भिक्षुक पुनर्वास से जुड़ी योजनाओं के जरिए जरूरतमंद लोगों को बेहतर जीवन और सम्मानजनक तरीके से आगे बढ़ने का अवसर देने का संदेश दिया गया।यानी लक्ष्य सिर्फ कटोरा खाली करना नहीं, बल्कि उस हाथ को ऐसा सहारा देना है कि भविष्य में उसे कटोरा उठाने की जरूरत ही न पड़े।

कभी फल विक्रेता बनकर समझी रेहड़ी-पटरी वालों की परेशानी

मनीष शर्मा का यह प्रयास सिर्फ भिक्षुकों तक सीमित नहीं रहा। स्ट्रीट वेंडर्स और छोटे कारोबारियों की जिंदगी को करीब से समझने के लिए उन्होंने फल विक्रेता का रूप भी धारण किया।फल की दुकान पर बैठकर उन्होंने लोगों से बातचीत की और प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना जैसी योजनाओं की जानकारी दी। छोटी रेहड़ी लगाने वाला व्यक्ति रोज सुबह अपना सामान लेकर निकलता है और शाम तक की कमाई से अपने परिवार का पेट पालता है। उसके लिए छोटी पूंजी भी कई बार बहुत बड़ा सहारा बन जाती है।ऐसे लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रयास इसी सोच के साथ किया गया कि छोटा कारोबार करने वाला व्यक्ति मजबूरी में नहीं, बल्कि सम्मान के साथ अपना रोजगार चला सके।

जनप्रतिनिधि की कुर्सी से ज्यादा जरूरी जनता का दर्द

मनीष शर्मा का यह अंदाज इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रखने के बजाय उसे सड़क तक ले जाने की कोशिश की।एमआईसी सदस्य के तौर पर उनके पास शहरी गरीबी उपशमन विभाग की जिम्मेदारी है। ऐसे में गरीब, जरूरतमंद, भिक्षुक और छोटे कारोबारियों तक योजनाओं की जानकारी पहुंचाना उनके विभाग की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा है। लेकिन इस बार तरीका अलग था। उन्होंने खुद उस व्यक्ति का रूप धारण किया, जिसके लिए योजना बनाई गई है। यही वजह है कि इस पहल ने लोगों का ध्यान खींचा।

सोशल मीडिया पर वीडियो ने खींचा ध्यान

मनीष शर्मा के इन अलग-अलग रूपों के वीडियो सोशल मीडिया पर भी चर्चा में हैं। वीडियो में उनका बदला हुआ हुलिया देखकर लोग पहले हैरान होते हैं और बाद में इसके पीछे की वजह समझ में आती है।कई लोगों ने इस प्रयास को गरीबों और जरूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने का अलग तरीका बताया है। वहीं इस पहल ने यह सवाल भी सामने रखा है कि योजनाएं चाहे कितनी भी अच्छी हों, उनका असली फायदा तभी है जब उनकी जानकारी उस व्यक्ति तक पहुंचे, जिसके लिए वे बनाई गई हैं।

योजना तभी सार्थक, जब जरूरतमंद तक पहुंचे उसका लाभ

सरकारी योजनाओं की जानकारी अक्सर कार्यालयों, पोस्टरों और अभियानों तक सीमित रह जाती है। लेकिन गरीब और वंचित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा जानकारी के अभाव में इन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाता।मनीष शर्मा के इस प्रयास का संदेश यही है कि जरूरतमंद को दफ्तर तक बुलाने के बजाय जनप्रतिनिधि को जरूरतमंद तक पहुंचना होगा।भिक्षुक के हाथ में कटोरा देखकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन उस कटोरे को हमेशा के लिए हटाने की कोशिश करना असली चुनौती है।

एक तस्वीर ने पूछ लिया बड़ा सवाल…

फटे कपड़ों में सड़क पर बैठे एक व्यक्ति को देखकर शायद लोग आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन जब वही व्यक्ति शहर का जनप्रतिनिधि निकले, तो तस्वीर बदल जाती है।मनीष शर्मा के इस प्रयास ने कम से कम इतना जरूर सोचने पर मजबूर किया है कि गरीबी को सिर्फ दूर से देखकर समझा नहीं जा सकता। उसे समझने के लिए उस व्यक्ति के करीब जाना पड़ता है, उसकी परेशानी सुननी पड़ती है और उसे सम्मान के साथ आगे बढ़ने का रास्ता देना पड़ता है।एक जनप्रतिनिधि का यह रूप भले ही कुछ समय के लिए था, लेकिन संदेश बड़ा है—गरीब को दया नहीं, अवसर चाहिए… हाथ में कटोरा नहीं, हाथ में काम चाहिए… और सरकारी योजना सिर्फ कागज पर नहीं, जरूरतमंद की जिंदगी में बदलाव लेकर आए, तभी उसकी असली सफलता है।

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