Dharm Desk – रक्षाबंधन के पावन पर्व पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र (राखी) बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि कलाई पर बांधी गई राखी को कितने दिनों बाद और किस दिन उतारना होता है… देश के अलग-अलग हिस्सों में राखी विसर्जन को लेकर भिन्न-भिन्न मान्यताएं है, लेकिन छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में इसको लेकर एक बेहद खास और पवित्र परंपरा चली आ रही है।

छत्तीसगढ़ी लोक परंपरा
इसके अनुसार, रक्षाबंधन के दिन बांधी गई राखी को तुरंत नहीं उतारा जाता है। भाई इसे अपनी कलाई पर सहेज कर रखते है और रक्षाबंधन के ठीक 6 दिन बाद आने वाले कमरछठ (हलषष्ठी) के पर्व पर इसे विधि-विधान से उतारते है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखा जा है। इस दिन माताएं हलषष्ठी देवी और भगवान बलराम की पूजा-अर्चना करती हैं। पूजा समाप्त होने के बाद घर के पुरुष व बच्चे अपनी कलाई से राखी (रक्षा सूत्र) उतारते है। कुछ मान्यताओं में इस दिन माताएं अपने बच्चों को अगर राखी रक्षा सूत्र बनती भी है।
रक्षा सूत्र विसर्जन के नियम
धार्मिक और लोक मान्यताओं में रक्षासूत्र को अत्यंत शुभ और पवित्र माना है, इसलिए इसे उतारते समय स्वच्छता और सम्मान का विशेष ध्यान रखा जाता है।
- जल विसर्जन: कलाई से उतारी गई, राखी को कभी भी कचरे में नहीं फेंकना चाहिए। सूती या रेशमी धागे से बनी राखी को बहते हुए स्वच्छ जल में प्रवाहित करने की परंपरा है।
- भू-विसर्जन: जल स्रोत उपलब्ध न होने पर इसे घर या बगीचे के किसी साफ-सुथरे स्थान पर मिट्टी में दबा (भू-विसर्जन) दिया जाता है। इसके लिए सबसे अच्छा स्थान तुलसी के पौधे के पास या बेलपत्र के पेड़ के नीचे भी हो सकता है।
- प्लास्टिक व धातु वाली राखी: आधुनिक सयन में यदि राखी में प्लास्टिक, धातु या अन्य अजैविक सामग्रियां लगी हों, तो जल प्रदूषण से बचने के लिए धागे को अलग करके विसर्जित करें और अन्य सामग्री का सुरक्षित निस्तारण कर दे।
- खुद से टूट जाए : यदि रक्षा सूत्र स्वतः टूट जाए या खूल जाए, तो इसे अपशकुन नहीं माना जाता। इसे सम्मान पूर्वक किसी धार्मिक या साफ स्थान पर रखकर परंपरा अनुसार विसर्जित कर देना चाहिए ।
कमरछठ की मुख्य पूजा विधि और नियम
कमरछठ के दिन माताएं पसई के चावल (बिना हल जुते उगे चावल), महुआ, दही, और 6 प्रकार की भाजी का उपयोग पूजा और प्रसाद में करती हैं। इस दिन हल से जुता हुआ कोई भी अन्न या फल-सब्जी ग्रहण नहीं की जाती। घर के आंगन में प्रतीक स्वरूप ‘सगरी’ (तालाब) बनाकर उसकी पूजा की जाती है, और संतान की पीठ पर पसई चावल व दही का टीका (पोती) लगाया जाता है।


