Dharm Desk – भक्तों की साधारण पूजा से प्रसन्न होने वाले शिव उनके भोले स्वरूप के कारण ही भोलेनाथ के आते है। मंदिरों में आपने देखा होगा कि लोग भगवान शिवजी पर जल चढ़ाते हैं और साथ में बेल पत्र भी अर्पित करते है, कई लोग इसे रोज की पूजा का हिस्सा मानते हैंl लेकिन इसके पीछे की वजह हर किसी को साफ तौर पर नहीं पता होती।

शिव पुराण कथा
धार्मिक ग्रंथ शिव पुराण में इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब भयंकर हलाहल विष निकला, जो कितना प्रभावशाली था कि संसार की तरफ धीरे-धीरे करके बढ़ने लगा।इसी में इतनी शक्ति नहीं थी कि इस विश के प्रभाव को रोक सके। तो उसे भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया था। इसके बाद उनके शरीर में तीव्र गर्मी बढ़ गई। उस समय देवताओं ने उन्हें शीतलता देने के लिए जल अर्पित किया। यहीं से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई है।
क्या है बेलपत्र का महत्व
बेलपत्र की तीन पत्तियों से जुड़ी कई मान्यताएं है।तीन पत्तों को कहीं त्रिदेव (सृजन, पालन और विनाश के देव ब्रह्मा, विष्णु और शिव) तो कहीं तीन गुणों (सत्व, रज और तम) तो कहीं तीन आदि ध्वनियों (जिनकी सम्मिलित गूंज से ओम बनता है) का प्रतीक माना जाता हैl बेलपत्र की इन तीन पत्तियों को महादेव की तीन आंखें या उनके शस्त्र त्रिशूल का भी प्रतीक माना जाता है। इसी तरह बेल पत्र को भी शिव पूजा में खास स्थान मिला है। कहा गया है कि शिवजी को यह बेल पत्र अत्यंत प्रिय है। पूजा के दौरान जब इसे अर्पित किया जाता है, तो यह साधाणर चढ़ावा नहीं माना जाता, बल्कि भक्ति का प्रतीक समझा जाता है। खास बात यह है कि बेलपत्र हमेशा साफ और बिना टूटा हुआ होना चाहिए, तभी उसे पूजा में उपयोग करना उचित माना गया है।
पूजा की विधि
भोले नाथ को प्रसन्न करने की पूजा बहुत जटिल नहीं बताई गई। सामान्य रूप से पहले एक लोटा जल चढ़ाना भी पूरी पूजा है। फिर बेलपत्र अर्पित किया जाता है। कई लोग इस दौरान ओम नमः शिवाय का जाप भी करते है।धार्मिक मान्यता यही कहती है कि यहां बाहरी दिखावे से ज्यादा महत्व मन की भावना का होता है। शायद यही वजह है कि आज भी साधारण जल और कुछ बेल पत्र के साथ की गई, पूजा को शिवजी तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता है।


