Dharam Desk: सावन मास भगवान शिव की उपासना का सबसे पवित्र समय है। इस समय लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री, देवघर और अन्य पवित्र तीर्थों से गंगाजल लेकर पैदल कांवड़ यात्रा कर रहे हैं। इस बार कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू होकर 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि के दिन जलाभिषेक के साथ संपन्न होगी। यात्रा के दौरान मार्गों पर जगह-जगह सेवा शिविर लगाए जाते हैं, जहां कांवड़ियों को भोजन, पेयजल, शरबत, फल, दवाइयां और विश्राम की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ियों की सेवा करने से भगवान शिव की सेवा के समान पुण्य मिलता है।

क्यों मानी जाती है कांवड़ियों की सेवा शिव-सेवा?

कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने की यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, तप, अनुशासन और समर्पण का प्रतीक है। कांवड़िए कई दिनों तक कठिन नियमों का पालन करते हैं। वे सात्विक जीवन अपनाते हैं, मादक पदार्थों से दूर रहते हैं और पूरी यात्रा के दौरान “बोल बम” तथा “हर-हर महादेव” का जयघोष करते हुए भगवान शिव का स्मरण करते हैं।

मान्यता है कि, ऐसे शिवभक्त भगवान के कार्य में लगे होते हैं। इसलिए उनकी सेवा करना स्वयं महादेव की सेवा करने के समान है। इसी आस्था के कारण श्रद्धालु कांवड़ियों को जल पिलाने, भोजन कराने, चिकित्सा सहायता देने और उनके विश्राम की व्यवस्था करने को पुण्य का कार्य मानते है। यह सेवा निस्वार्थ भाव, करुणा और शिव भक्ति की अभिव्यक्ति मानी जाती है।

सेवा में छिपा है त्याग, समर्पण और भक्ति का संदेश

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु गर्मी, बारिश और लंबी पैदल यात्रा जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं। ऐसे में उनकी सहायता करना ‘सेवा ही धर्म’ और ‘अतिथि देवो भव’ जैसे आदर्शों से भी जोड़इी है। भगवान शिव अपने भक्तों से अत्यंत प्रसन्न रहते हैं और जो व्यक्ति उनके भक्तों की नि:स्वार्थ सेवा करता है। उस पर भी शिव की विशेष कृपा बनी रहती है।

सावन मास में दान, अन्नदान, जलदान और सेवा का विशेष महत्व बताया गया है। यही कारण है कि विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठन कांवड़ मार्गों पर निःशुल्क सेवा शिविर लगाकर सेवा प्रदान करते है। इसे केवल सामाजिक सहयोग नहीं, बल्कि शिवभक्ति का एक महत्वपूर्ण स्वरूप भी माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ियों की सेवा करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता का संचार होता है।

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