न्यामुद्दीन अली, अनूपपुर/कोतमा। मध्य प्रदेश में सरकारें भले ही विकास और स्वच्छ भारत अभियान के कितने ही बड़े-बड़े दावे कर लें लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है। ऐसी है एक तस्वीर सामने आई है अनूपपुर जिले के कोतमा जनपद से। जहां ग्राम पंचायत बेलिया छोट स्थित शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में नौनिहालों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। विद्यालय में पढ़ने वाले 177 मासूम बच्चे पढ़ाई के नाम पर हर दिन एक नरकीय और असुरक्षित वातावरण के बीच बैठने को विवश हैं। स्कूल परिसर के ठीक बगल में लंबे समय से कचरे का अंबार लगा हुआ है। जिससे उठने वाली असहनीय दुर्गंध और जहरीले जीवों के खतरे ने मासूमों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया है।

कचरे के ढेर में हैंडपंप… 200 ग्रामीणों और बच्चों की जिंदगी दांव पर!
विद्यालय प्रबंधन और ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार, इस परिसर में लापरवाही का यह खेल बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। स्कूल के ठीक पीछे स्थित एकमात्र हैंडपंप ही विद्यालय के सभी बच्चों और लगभग 200 की आबादी वाले पूरे गांव के लिए पेयजल का इकलौता जरिया है।
इस हैंडपंप के चारों तरफ कचरे का अंबार लगा हुआ है। हालात इतने बदतर हैं कि वर्तमान में जारी बरसात के मौसम के कारण इस कचरे से लगातार सांप, बिच्छू और अन्य जहरीले जीव निकल रहे हैं। पानी भरने जाने वाले बच्चों और ग्रामीणों के सिर पर हर वक्त किसी बड़ी अनहोनी या हादसे का खौफ मंडराता रहता है।

पुरानी पंचायत बिल्डिंग बनी ‘आफत’… ऐसे लगा गंदगी का अंबार
इस पूरी अव्यवस्था और लापरवाही की शुरुआत कैसे हुई, इसका सस्पेंस खोलते हुए प्राचार्य और बच्चों ने बताया कि विद्यालय के पास पहले ग्राम पंचायत का पुराना भवन संचालित होता था। जब नया पंचायत भवन बनकर तैयार हुआ तो जिम्मेदार पुराने भवन को ढहाना या हटाना ही भूल गए। न तो उस परिसर की सफाई कराई गई और न ही उसे घेरा गया।
नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले के लोगों ने इसे कचरा फेंकने का केंद्र बना लिया। इस डंपिंग ग्राउंड से उठने वाली भयानक दुर्गंध के कारण स्कूल का वातावरण पूरे समय दूषित रहता है। बच्चों का पढ़ाई में मन लगना तो दूर, उनका दम घुटने लगता है और गंभीर बीमारियों का खतरा पैदा हो गया है।

स्वच्छता के नारों के नीचे ‘नरक’… दावों और हकीकत का खौफनाक अंतर
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी और कड़वी विडंबना यह है कि जिस दीवार पर ग्राम पंचायत ने बड़े-बड़े अक्षरों में ज्ञान बघारा है, उसी के नीचे गंदगी का राज है। पंचायत ने स्कूल के पास दीवारों पर लिखवाया है- ‘हम सब ने यह ठाना है, भारत को स्वच्छ बनाना है’ और ‘स्वच्छता को अपनाना है, गंदगी को दूर भगाना है’।
इन्हीं चमचमाते नारों के ठीक नीचे कचरे का विशाल सड़ता हुआ ढेर लगा हुआ है, जो प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच के खौफनाक अंतर को साफ बयां कर रहा है। आक्रोशित ग्रामीणों, अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन ने अब जिला प्रशासन से मांग की है कि पुराने भवन को मलबे समेत हटाकर यहां सुरक्षित माहौल बनाया जाए।

शिक्षा के मंदिर को कचराघर बना देना सीधे तौर पर एक गंभीर अपराध है। 177 बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ यह लापरवाही बर्दाश्त से बाहर है। क्या जिला प्रशासन बिना किसी देरी के इस पूरे कचरे को वहां से हटाए और दोषी पंचायत पदाधिकारियों व जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई की जाए। बच्चों को भयमुक्त और स्वच्छ वातावरण में पढ़ने का अधिकार है, जिसे यह भ्रष्ट और सुस्त सिस्टम नहीं छीन सकता।

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