हेमंत शर्मा, इंदौर। हाईकोर्ट ने धार भोजशाला मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ माना कि भोजशाला केवल एक विवादित ढांचा नहीं, बल्कि राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा और मां वाग्देवी की आराधना का प्रमुख केंद्र रही है। कोर्ट के फैसले के बाद हिंदू संगठनों में जश्न का माहौल बन गया, वहीं वर्षों से चल रही कानूनी लड़ाई में मुस्लिम पक्ष को बड़ा झटका लगा है।

“700 साल का दर्द” कोर्ट में गूंजा

फैसले में कोर्ट ने उस पूरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का जिक्र किया, जिसमें हिंदू पक्ष ने दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र था, जिसे मुस्लिम आक्रमणों के दौरान नुकसान पहुंचाया गया। याचिका में कहा गया कि हिंदुओं को पूजा से रोकना उनके धार्मिक अधिकारों का हनन है।

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हिंदू पक्ष की बड़ी मांगें

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से कोर्ट में मांग रखी गई थी कि भोजशाला परिसर में केवल हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिले, मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति न दी जाए और मां वाग्देवी की प्रतिमा को दोबारा स्थापित किया जाए। साथ ही लंदन म्यूजियम में रखी मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग भी की गई।

ASI के 2003 के आदेश पर भी उठा सवाल

याचिका में 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई, जिसमें मुस्लिम पक्ष को शुक्रवार को नमाज और हिंदू पक्ष को सीमित समय में पूजा की अनुमति दी गई थी। हिंदू पक्ष ने इसे “हिंदुओं के अधिकारों पर प्रतिबंध” बताया।

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“भोजशाला में मंदिर के सबूत मौजूद”

सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने कोर्ट में दावा किया कि भोजशाला परिसर में हवन कुंड, संस्कृत व्याकरण के शिलालेख, देवी-देवताओं की आकृतियां और मंदिर शैली की संरचनाएं मौजूद हैं, जो इसे मस्जिद नहीं बल्कि प्राचीन मंदिर साबित करती हैं।

फैसले के बाद गूंजे “जय मां वाग्देवी” के नारे

फैसला आते ही इंदौर हाईकोर्ट परिसर के बाहर हिंदू संगठनों और समर्थकों ने जयकारे लगाए। मां वाग्देवी की तस्वीर और प्रतिमा लेकर पहुंचे कार्यकर्ताओं ने इसे “सनातन आस्था की जीत” बताया।

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चार साल चली कानूनी लड़ाई

इस मामले में 2022 से लगातार सुनवाई चल रही थी। कई बार तारीखें लगीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नियमित सुनवाई शुरू हुई और आखिरकार 15 मई 2026 को हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया।

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