लखनऊ. 17 दिन में चीनी 19 रुपये महंगी होकर फुटकर बाजार में 65 रुपये और थोक में 60 रुपये प्रति किलो पहुंच गई. चाय दुकानदार, मिठाई कारोबारी और सबसे बढ़कर आम उपभोक्ता इसकी मार झेल रहे हैं. 11 अगस्त को मैंने सवाल उठाया था कि E20 नीति के तहत गन्ने और मक्के जैसी फसलों को ‘खाद्य से ईंधन’ की दिशा में मोड़ने का असर देश की खाद्य सुरक्षा और चीनी की कीमतों पर क्या पड़ेगा. विशेषज्ञों के अनुसार, अब करीब 30 लाख टन चीनी के बराबर उत्पादन एथेनॉल की ओर डायवर्ट होने की बात सामने आ रही है.
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कच्चे तेल के आयात और विदेशी मुद्रा के दबाव को कम करने के लिए E20 नीति लाई गई है, लेकिन भारत आयातित कच्चे तेल का उपभोग केवल घरेलू ऊर्जा जरूरतों के लिए नहीं करता, बल्कि उसे रिफाइन करके पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी करता है. कुल आयातित कच्चे तेल का लगभग एक-चौथाई हिस्सा रिफाइनिंग के बाद पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में निर्यात किया जाता है. रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है और इससे बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित होती है.
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ऐसे में सवाल है, जब भारत आयातित कच्चे तेल को रिफाइन करके पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है, तो E20 के लक्ष्य पूरे करने के लिए गन्ने और मक्के जैसी खाद्य फसलों को एथेनॉल की ओर मोड़ने की कीमत देश की खाद्य सुरक्षा और आम उपभोक्ता को क्यों चुकानी पड़े? इसका असर अब चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर दिख रहा है और हालात चीनी आयात करने की नौबत तक पहुंच गए हैं. संबंधित मंत्री से न पूछकर सरकार से इसलिए पूछ रहा हूं कि आपके यहां पता ही कौन-सा मंत्री जवाब देगा! सरकार E20 नीति की व्यापक समीक्षा करे और चीनी के बढ़ते दामों पर तत्काल प्रभावी कदम उठाए. “E20 का जुनून, जनता मजबूर!”

