अभय मिश्रा, मऊगंज। मऊगंज जिले के नईगढ़ी में कुदरत के कहर से ज्यादा प्रशासनिक बेरुखी और लापरवाही भारी पड़ रही है। नईगढ़ी नगर पूरी तरह जलमग्न हो चुका है, घर डूब रहे हैं, दीवारें गिर रही हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं। लेकिन सबसे शर्मनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर आई अष्टभुजा नदी के पास से, जहां एक गरीब मजदूर बह रही शीट को बचाने के चक्कर में तेज बहाव में बह गया और दो घंटे तक पानी के बीचों-बीच एक पत्थर को पकड़कर जिंदगी और मौत से लड़ता रहा।
सैकड़ों लोग तमाशा देखते रहे, और जनता की सुरक्षा का दम भरने वाली प्रशासन-SDRF की टीम घंटों गायब रही। नतीजा यह हुआ कि 2 घंटे तक चीखने-चिल्लाने के बाद वह मजदूर पानी के तेज बहाव में बह गया। 7 घंटे बीत जाने के बाद भी निर्माणाधीन भवन की छत पर 3 मजदूर अब भी जिंदगी की आस में अटके हुए हैं। साहब लोग सरकारी गाड़ियों में शीशे चढ़ाकर बैठे रहे और जैसे ही कैमरे ऑन हुए, रफूचक्कर हो गए। आखिर इस मौत का जिम्मेदार कौन है?
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले का नईगढ़ी कस्बा आज प्रशासनिक लापरवाही का सबसे खौफनाक गवाह बना। भारी बारिश की चेतावनी के बावजूद न तो सुरक्षा के कोई इंतजाम थे और न ही आपदा प्रबंधन की कोई तैयारी। अमृत योजना के तहत चल रहे निर्माण कार्य में ठेकेदार ने नियमों को ताक पर रखकर मजदूरों को असुरक्षित निर्माणाधीन भवन में ठहराया था। सुबह जब पानी का विकराल रूप सामने आया, तो अपनी रोजी-रोटी का सामान बचाने की कोशिश में गोरखपुर का एक मजदूर उफनती नदी की चपेट में आ गया।
देखते ही देखते मजदूर एक पत्थर के सहारे टिक गया। दो घंटे तक वह उफनती धारा के बीच चीखता रहा, मदद की गुहार लगाता रहा। पुलिया पर सैकड़ों का हुजूम खड़ा था, लेकिन उफान इतना तेज था कि कोई नीचे उतरने की हिम्मत नहीं जुटा सका। और आखिकार श्रमिक तेज बहाव के बह गया,लेकिन मऊगंज मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर की दूरी तय करने में प्रशासन को घंटों लग गए। प्रशासनिक अमला, एसडीएम और पुलिसकर्मी मौके पर तो पहुंचे, लेकिन गाड़ियों के शीशे बंद कर तमाशबीन बने रहे। जब मीडिया का कैमरा घूमा, तो साहब के ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा ली।
समय पर न तो SDRF पहुंची और न NDRF। आखिरकार दो घंटे तक सांसों की जंग लड़ता हुआ वह बेबस मजदूर तेज बहाव में बह गया, जिसका अब तक कोई अता-पता नहीं है। यह अकेली तबाही नहीं है- निर्माणाधीन भवन की छत पर सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक 3 मजदूर जान बचाने के लिए भूखे-प्यासे फंसे रहे। नईगढ़ी नगर के कई वार्ड डूब चुके है, तहसील कार्यालय से लेकर दो छात्रावासों तक में पानी घुस गया है। सड़कों पर तेज बहाव के बीच लोग जान जोखिम में डालकर निकलने को मजबूर हैं।
मौसम विभाग की स्पष्ट चेतावनी के बाद भी अगर 12 किलोमीटर दूर पहुंचने में रेस्क्यू टीम को घंटों लग जाएं, तो इसे महज लेत-लतीफी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर व्यवस्था की संवेदनहीनता कहा जाएगा। ठेकेदार की लापरवाही और प्रशासन की इस चुप्पी ने एक गरीब मजदूर की बलि ले ली है। अब सवाल यह है कि इस दर्दनाक हादसे और लापरवाही का हिसाब कौन देगा?
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