लखनऊ. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर कड़ी टिप्पणी की है. गोंडा निवासी जाहिद अली की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस शक्तिशाली कानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों के उत्पीड़न के लिए नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने गोंडा डीएम के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें जाहिद को गुंडा घोषित कर छह महीने के लिए जिलाबदर किया गया था.

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गुंडा एक्ट के इस्तेमाल पर कोर्ट ने जताई चिंता

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा कि लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि राज्य सरकार गुंडा एक्ट का इस्तेमाल उत्पीड़न के हथियार के तौर पर कर रही है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का इस्तेमाल सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए बेहद सावधानी और स्पष्ट परिस्थितियों में किया जाना चाहिए.

डीएम का आदेश और अपीलीय फैसला रद्द

11 मई 2026 को गोंडा डीएम ने जाहिद के खिलाफ जिलाबदर का आदेश जारी किया था. इसमें 2010 और 2020 में दर्ज दो आपराधिक मामलों के साथ एक बीट सूचना रिपोर्ट का भी जिक्र था. सुनवाई के दौरान सामने आया कि 2010 के मामले में जाहिद अगस्त 2017 में ही बरी हो चुका था. इसके बावजूद मामले को आधार बनाए जाने पर कोर्ट ने डीएम के आदेश को रद्द कर दिया. आयुक्त का अपीलीय आदेश भी निरस्त कर दिया गया.

एक मामले से आदतन अपराधी साबित नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी एक आपराधिक मामले में संलिप्तता से किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस मामले में आरोपी बरी हो चुका है, उसके आधार पर उसे गुंडा घोषित नहीं किया जा सकता.

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बीट रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई पर भी सवाल

कोर्ट ने बीट सूचना रिपोर्ट को कार्रवाई का पर्याप्त आधार मानने से इनकार किया. अदालत के अनुसार, ऐसी रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा. हाईकोर्ट की यह टिप्पणी गुंडा एक्ट के तहत होने वाली कार्रवाई में पुलिस और प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण कानूनी दिशा-निर्देश मानी जा रही है.