अंबाला। हरियाणा के अंबाला जिले के धन्यौड़ा गांव में बोरवेल में गिरे 4 वर्षीय मासूम निरवैर की जिंदगी आखिरकार मौत से जंग हार गई। सेना, NDRF, SDRF और प्रशासन की टीमें करीब 21 घंटे तक लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन चलाती रहीं, लेकिन बुधवार तड़के करीब साढ़े तीन बजे जब बच्चे को 220 फीट गहरे बोरवेल से बाहर निकाला गया तो वह मृत मिला। इस दर्दनाक हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। बताया जा रहा है कि निरवैर अपने माता-पिता की 12 साल की मन्नतों के बाद पैदा हुआ था और परिवार की आंखों का तारा था।
बुधवार सुबह अंबाला सिटी के नागरिक अस्पताल में मेडिकल बोर्ड ने पोस्टमार्टम किया। डॉक्टरों के अनुसार निरवैर के शरीर पर गिरने से चोट और रगड़ के निशान मिले। उसके सिर, छाती और दोनों घुटनों पर गंभीर चोटें थीं, जबकि फेफड़ों में मिट्टी मिला पानी (मडी वॉटर) पाया गया। डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि मासूम की मौत गिरने से लगी चोटों और डूबने, दोनों कारणों से हुई। आशंका है कि बोरवेल में गिरने के कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई थी।
दोपहर को मासूम का पार्थिव शरीर गांव धन्यौड़ा लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए कुछ देर रखा गया। इसके बाद गांव के श्मशान घाट में गमगीन माहौल में उसका अंतिम संस्कार किया गया। पिता मनजीत सिंह ने कांपते हाथों से अपने इकलौते बेटे को मुखाग्नि दी। पूरे गांव की आंखें नम थीं और हर कोई इस दर्दनाक हादसे से स्तब्ध दिखाई दिया।
पुलिस ने भी मामले में कार्रवाई करते हुए परिजनों की शिकायत पर खेत मालिक और खेत ठेके पर लेने वाले लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106 के तहत लापरवाही से मौत का मामला दर्ज कर लिया है। परिवार का आरोप है कि बोरवेल से मोटर निकालने के बाद उसे खुला छोड़ दिया गया था। यदि समय रहते उसे बंद कर दिया जाता तो यह हादसा नहीं होता।
गांव के लोगों के अनुसार निरवैर का जन्म परिवार की करीब 12 साल की मन्नतों के बाद हुआ था। उसकी एक बड़ी बहन है। गर्मी की छुट्टियों के बाद वह सोमवार को ही नानी के घर से लौटा था और अगले दिन स्कूल खुलना था। मंगलवार सुबह उसने अपने पिता से खेत चलने की जिद की। खेत पहुंचकर वह खेलते-खेलते खुले बोरवेल के पास चला गया। बताया जाता है कि वह उसमें मिट्टी डाल रहा था और अंदर झांकने के दौरान बोरवेल के आसपास की गीली मिट्टी धंस गई, जिससे उसका पैर फिसल गया और वह सीधे गहरे बोरवेल में जा गिरा।

हादसे के बाद सेना, NDRF, SDRF और जिला प्रशासन ने पूरी ताकत के साथ रेस्क्यू अभियान चलाया। आधुनिक मशीनों और समानांतर गड्ढा खोदकर बच्चे तक पहुंचने की कोशिश की गई, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद मासूम को जिंदा नहीं बचाया जा सका।
यह दर्दनाक हादसा एक बार फिर प्रशासन और आम लोगों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर गया है कि आखिर खुले बोरवेल कब तक मासूमों की जान लेते रहेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खुले बोरवेल समय पर बंद और सुरक्षित किए जाएं तो ऐसे हादसों को रोका जा सकता है। अब पूरे प्रदेश की नजर इस बात पर है कि इस मामले में जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होती है और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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