Amer Fort XRF Technology: जयपुर स्थित विश्व धरोहर आमेर महल की ऐतिहासिक भित्ति चित्रकारी को सुरक्षित रखने के लिए राजस्थान में पहली बार अत्याधुनिक एक्स-रे फ्लोरोसेंस (XRF) तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया गया है। करीब 1 करोड़ रुपये कीमत की इस मशीन की मदद से महल की दीवारों पर बने सदियों पुराने प्राकृतिक रंगों और उनकी रासायनिक संरचना का बिना किसी नुकसान के वैज्ञानिक परीक्षण किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक धरोहर संरक्षण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव साबित होगी। इससे मूल चित्रकारी को सुरक्षित रखते हुए संरक्षण का काम पहले से अधिक सटीक और वैज्ञानिक तरीके से किया जा सकेगा।

2.32 करोड़ रुपये की परियोजना पर चल रहा काम

आमेर महल की ऐतिहासिक भित्ति चित्रकारी के संरक्षण का जिम्मा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) की विशेषज्ञ टीम को सौंपा गया है। आईजीएनसीए के प्रोजेक्ट मैनेजर कीर्ति पाल सिंह के अनुसार, करीब 2.32 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत सिंहपोल, गणेशपोल, भोजनशाला और मानसिंह महल की चित्रकारी का चरणबद्ध तरीके से संरक्षण किया जा रहा है। पहले चरण में मल्टी स्पेक्ट्रम इमेजिंग के जरिए चित्रों की सूक्ष्म जांच की गई। अब दूसरे चरण में दिल्ली से आई विशेषज्ञ टीम XRF तकनीक से प्राकृतिक रंगों और उनमें मौजूद खनिज तत्वों का विश्लेषण कर रही है।

बिना छुए बताएगी रंगों का पूरा इतिहास

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि चित्रों से किसी भी प्रकार का नमूना लेने, खुरचने या काटने की जरूरत नहीं पड़ती। XRF मशीन एक्स-रे किरणों की मदद से कुछ ही मिनटों में यह पता लगा लेती है कि किसी चित्र में कौन-कौन से प्राकृतिक खनिज और रासायनिक तत्व मौजूद हैं। इससे यह भी जानकारी मिलेगी कि सदियों के दौरान रंगों में कितना बदलाव आया है।

संरक्षण होगा अधिक सुरक्षित और सटीक

पुरानी चित्रकारी के संरक्षण में सबसे बड़ी चुनौती मूल रंगों को सुरक्षित रखना होती है। कई बार गलत रसायनों के इस्तेमाल से ऐतिहासिक चित्रों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। अब वैज्ञानिक परीक्षण के बाद विशेषज्ञ पहले से तय कर सकेंगे कि किस हिस्से पर कौन-सी संरक्षण सामग्री सुरक्षित रहेगी। इससे मरम्मत और सफाई का काम मूल चित्रकारी को नुकसान पहुंचाए बिना किया जा सकेगा।

मूल रंगों की पहचान भी होगी आसान

समय के साथ कई भित्ति चित्रों के रंग फीके पड़ चुके हैं, जबकि कुछ हिस्से क्षतिग्रस्त भी हो गए हैं। XRF तकनीक से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर विशेषज्ञ वर्तमान रंगों की तुलना मूल प्राकृतिक रंगों से कर सकेंगे। इसके बाद जहां जरूरत होगी, वहां उसी रंग संयोजन का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसका उपयोग मूल कलाकारों ने किया था। इससे चित्रों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता भी बनी रहेगी।

फिलहाल भोजनशाला में चल रहा परीक्षण

आईजीएनसीए की वैज्ञानिक अधिकारी अंजलि शर्मा ने बताया कि फिलहाल यह मशीन आमेर महल की भोजनशाला में काम कर रही है। इसके बाद गणेशपोल, सिंहपोल और मानसिंह महल की चित्रकारी का भी इसी तकनीक से परीक्षण किया जाएगा। हर स्थान से मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर अलग-अलग संरक्षण योजना तैयार की जाएगी।

दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों तक पहुंचेगी तकनीक

आमेर महल अधीक्षक राकेश छोलक ने बताया कि राजस्थान के संरक्षित स्मारकों में पहली बार इस स्तर पर XRF तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, जैसलमेर और रणथंभौर जैसे ऐतिहासिक किलों और महलों की भित्ति चित्रकारी के संरक्षण में भी इसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।

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