Bastar News Update: किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई उद्वहन सिंचाई योजनाएं कई गांवों में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही हैं। इन्द्रावती और नारंगी नदी से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए वर्षों पहले तैयार की गई नहरों की जर्जर स्थिति अब योजना की सफलता में बड़ी बाधा बन गई है। हाल ही में खराब पड़ी मोटरों की मरम्मत कर उन्हें दोबारा चालू किया गया है, लेकिन इसके बावजूद कई किसानों के खेत अब भी सिंचाई के पानी से वंचित हैं।
कुरूषपाल, नारायणपाल और टेमरा सहित कई गांवों के किसानों का कहना है कि नहरों की समय पर मरम्मत और पिचिंग नहीं होने के कारण पानी खेतों तक पहुंचने से पहले ही रास्ते में बह जाता है। नतीजतन खरीफ सीजन में भी पर्याप्त सिंचाई नहीं मिल पाती, जिससे फसलों की उत्पादकता प्रभावित होती है।

किसानों के अनुसार केवल मोटरों को चालू कर देने से समस्या का समाधान संभव नहीं है। जब तक नहरों की व्यापक मरम्मत और सुदृढ़ीकरण नहीं किया जाएगा, तब तक योजना का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाएगा। उनका कहना है कि कई स्थानों पर नहरों में रिसाव और टूट-फूट की समस्या लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन इसके स्थायी समाधान की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं।
वहीं दूसरी ओर बोदरा जैसे गांव इस योजना की सफलता का उदाहरण बनकर उभरे हैं। यहां नहरों की बेहतर स्थिति और नियमित जल आपूर्ति के कारण किसानों को खरीफ के साथ-साथ रबी सीजन में भी खेती का लाभ मिल रहा है। सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने से उत्पादन और आय दोनों में वृद्धि दर्ज की गई है।
किसानों का मानना है कि यदि नहरों की स्थिति सुधारी जाए और जल प्रबंधन को प्रभावी बनाया जाए तो उद्वहन सिंचाई योजनाएं क्षेत्र की कृषि व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती हैं। फिलहाल मोटरें चालू होने के बावजूद खेतों तक पानी नहीं पहुंचने से किसानों की उम्मीदें अधूरी नजर आ रही हैं।
पंचायतों की समस्याओं को लेकर सरपंचों ने खोला मोर्चा
जगदलपुर। बस्तर जिले के सरपंचों ने पंचायतों से जुड़ी लंबित समस्याओं और विकास कार्यों में आ रही बाधाओं को लेकर प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई है। शहीद पार्क में आयोजित जिला स्तरीय बैठक में जिलेभर से पहुंचे सरपंचों ने विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करते हुए त्वरित समाधान की मांग की। इसके बाद सरपंच संघ ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर आवश्यक कार्रवाई की मांग की।
बैठक में सरपंचों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान 15 दिनों के भीतर नहीं किया गया तो जिलेभर के सरपंच सामूहिक इस्तीफे पर विचार करने के लिए मजबूर होंगे। संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि लगातार मांगों के बावजूद पंचायतों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे लंबे समय से लंबित हैं, जिससे जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों दोनों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सरपंचों ने पांच माह से लंबित मानदेय भुगतान का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उनका कहना था कि समय पर मानदेय नहीं मिलने से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही उन्होंने मानदेय में वृद्धि की मांग भी दोहराई।
बैठक में ग्रामीण क्षेत्रों में अधूरे और रुके हुए विकास कार्यों पर भी चिंता व्यक्त की गई। सरपंचों के अनुसार सड़क, नाली, आंगनबाड़ी भवन और सामुदायिक भवनों सहित कई निर्माण कार्य संसाधनों और स्वीकृतियों के अभाव में प्रभावित हो रहे हैं। इससे गांवों के विकास की गति धीमी पड़ गई है।
जल जीवन मिशन के अंतर्गत चल रहे कार्यों की धीमी प्रगति पर भी सवाल उठाए गए। सरपंचों ने कहा कि कई गांवों में पेयजल योजनाएं अब तक पूरी नहीं हो सकी हैं, जिसके कारण ग्रामीणों को पर्याप्त पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
इसके अलावा पंचायतों को 16वें वित्त आयोग की राशि शीघ्र जारी करने की मांग भी रखी गई। सरपंचों का कहना है कि वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं और पंचायतों को अपने दायित्वों के निर्वहन में कठिनाई हो रही है। उन्होंने प्रशासन से सभी मांगों पर गंभीरता से विचार कर जल्द समाधान सुनिश्चित करने की अपील की।
सुकमा रेलवे कनेक्टिविटी की मांग तेज
सुकमा। नक्सलवाद के प्रभाव में कमी आने और विकास कार्यों को नई गति मिलने के बावजूद सुकमा जिला आज भी रेलवे कनेक्टिविटी से वंचित है। जिले की सीमाओं के आसपास कई महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन जिला मुख्यालय अब तक रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ सका है। ऐसे में क्षेत्र के लोगों की उम्मीदें अब रेल संपर्क पर टिक गई हैं।
जानकारी के अनुसार ओडिशा के मलकानगिरी तक प्रस्तावित रेल लाइन सुकमा से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तक पहुंचेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस परियोजना का सीमित विस्तार किया जाए तो सुकमा को सीधे रेलवे नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है। इससे जिले के विकास को नई दिशा मिलने के साथ ही लोगों की वर्षों पुरानी मांग भी पूरी हो सकती है।
वर्तमान में सुकमा के लोगों को रायपुर सहित प्रदेश और देश के बड़े शहरों तक पहुंचने के लिए लंबी सड़क यात्रा करनी पड़ती है। राजधानी रायपुर तक करीब 400 किलोमीटर का सफर समय और आर्थिक दोनों दृष्टि से लोगों पर अतिरिक्त बोझ डालता है। इसका सबसे अधिक असर छात्रों, मरीजों, नौकरीपेशा लोगों और व्यापारियों पर पड़ता है, जिन्हें नियमित रूप से लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में तेलंगाना के भद्राचलम तक रेल संपर्क स्थापित होने पर यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण व्यापारिक कॉरिडोर के रूप में विकसित हो सकता है। इससे वनोपज, कृषि उत्पादों और स्थानीय वस्तुओं को बड़े बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
इधर क्षेत्र के सांसद ने सुकमा को रेलवे नेटवर्क से जोड़ने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय के समक्ष रखने की जानकारी दी है। इसके साथ ही जिले में रेलवे आरक्षण काउंटर खोलने की मांग भी प्रमुखता से उठाई जा रही है, ताकि लोगों को टिकट बुकिंग के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर न रहना पड़े।
विकास के नए दौर में प्रवेश कर रहे सुकमा के लिए अब रेल कनेक्टिविटी केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक प्रगति की आधारशिला बनती जा रही है। ऐसे में जिलेवासियों की निगाहें सरकार और रेलवे मंत्रालय के आगामी निर्णयों पर टिकी हुई हैं।
कोंडागांव में 35 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण मुक्त, अब पुनर्वनीकरण की तैयारी
कोंडागांव। वन भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण के खिलाफ कोंडागांव वनमंडल ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मालगांव के आरक्षित वन क्षेत्र से 35 हेक्टेयर से अधिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया है। वन, राजस्व और पुलिस विभाग की संयुक्त टीम ने अभियान चलाकर कब्जाधारियों के खिलाफ कार्रवाई की और वर्षों से अतिक्रमण की चपेट में रही भूमि को मुक्त कराया।
अधिकारियों के अनुसार आरक्षित वन क्षेत्र में लंबे समय से अवैध खेती और अन्य गतिविधियां संचालित किए जाने की शिकायतें मिल रही थीं। प्रशासन की ओर से संबंधित लोगों को पहले नोटिस जारी कर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन निर्धारित समयावधि के बाद भी कब्जा नहीं हटाया गया। इसके बाद संयुक्त कार्रवाई करते हुए अतिक्रमित भूमि को खाली कराया गया।
वन विभाग ने बताया कि प्रभावित क्षेत्र में कुछ मकानों का भी निर्माण किया गया था, जिन्हें चिन्हित कर नियमानुसार कार्रवाई की गई। वन प्रबंधन समिति के सदस्यों के अनुसार यह क्षेत्र कभी घने साल और साजा के जंगलों से आच्छादित था, लेकिन लगातार अतिक्रमण और मानवीय गतिविधियों के कारण वन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा है।
अब वन विभाग पूरे क्षेत्र का विस्तृत सर्वे कर वास्तविक स्थिति का आकलन करेगा। इसके आधार पर भूमि के संरक्षण और विकास की कार्ययोजना तैयार की जाएगी। विभाग मुक्त कराई गई भूमि को पुनर्वनीकरण अभियान और लैंड बैंक योजना से जोड़ने की तैयारी कर रहा है, ताकि क्षेत्र में दोबारा हरियाली विकसित की जा सके और वन संपदा को संरक्षित किया जा सके।
वन अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि जिले के अन्य चिन्हित अतिक्रमण प्रभावित क्षेत्रों में भी जल्द इसी तरह के अभियान चलाए जाएंगे। विभाग का कहना है कि वन भूमि की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी रहेगी।
बार-बार खराब हो रहे ट्रांसफार्मर ने बढ़ाई परेशानी
कोंडागांव। शहर के अंबेडकर वार्ड में ट्रांसफार्मर जलने की घटना ने विद्युत व्यवस्था की तैयारियों और रखरखाव पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार से ही ट्रांसफार्मर में चिंगारियां निकलने की शिकायतें मिल रही थीं, लेकिन समय रहते समस्या का समाधान नहीं हो सका। मंगलवार रात ट्रांसफार्मर पूरी तरह जल गया, जिससे अंबेडकर वार्ड और रविंद्रनाथ टैगोर वार्ड के 500 से अधिक घरों की बिजली आपूर्ति अचानक बंद हो गई।
बिजली गुल होने के बाद सैकड़ों परिवारों को घंटों अंधेरे और गर्मी के बीच परेशानी झेलनी पड़ी। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे लंबे समय से ट्रांसफार्मर की क्षमता बढ़ाने और उसे बदलने की मांग कर रहे थे। करीब पांच वर्ष पहले स्थापित यह ट्रांसफार्मर लगातार बढ़ते विद्युत भार के कारण क्षमता से अधिक लोड वहन कर रहा था। गर्मी के मौसम में इसमें बार-बार तकनीकी खराबियां सामने आती रही थीं और इससे जुड़े केबलों में आग लगने की घटनाएं भी हो चुकी थीं।
घटना की जानकारी मिलते ही विद्युत विभाग की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया। इसके बाद क्षतिग्रस्त ट्रांसफार्मर को हटाकर 100 एचपी क्षमता का नया ट्रांसफार्मर स्थापित किया गया। मरम्मत और स्थापना कार्य पूरा होने के बाद करीब 12 से 14 घंटे के अंतराल में क्षेत्र की बिजली आपूर्ति बहाल की जा सकी।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते ट्रांसफार्मर बदला गया होता तो इतनी बड़ी समस्या से बचा जा सकता था। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि बढ़ते विद्युत भार के अनुरूप बिजली ढांचे को मजबूत करने और समय-समय पर आवश्यक उन्नयन करने की जरूरत है, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याओं की पुनरावृत्ति न हो।
हरिहर महायज्ञ में उमड़ा आस्था का सैलाब, सनातन अनुष्ठानों से भक्तिमय हुआ जगदलपुर
जगदलपुर। बस्तर मुख्यालय जगदलपुर में पुरुषोत्तम मास के अवसर पर आयोजित हरिहर महायज्ञ श्रद्धा, भक्ति और सनातन परंपराओं का भव्य संगम बन गया है। महायज्ञ अब अपने आध्यात्मिक शिखर की ओर अग्रसर है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंचकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागी बन रहे हैं।
महायज्ञ के छठवें दिन 12 पार्थिव शिवलिंगों का निर्माण कर विधि-विधान से विशेष अभिषेक और पूजन किया गया। वहीं भूतेश्वर महादेव के समक्ष आयोजित लक्ष बिल्वार्चना अनुष्ठान में सवा लाख बेलपत्र अर्पित कर भगवान शिव की आराधना की गई। सुबह से शुरू हुए धार्मिक कार्यक्रम देर शाम तक जारी रहे और पूरे परिसर में हर-हर महादेव के जयघोष गूंजते रहे।
आयोजकों ने बताया कि महायज्ञ का मुख्य उद्देश्य विश्व शांति, मानव कल्याण और सनातन संस्कृति के संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाना है। एकादशी के अवसर पर भगवान विष्णु की लक्ष तुलसी अर्चना का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सवा लाख तुलसी दल अर्पित कर विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी।
महायज्ञ की पूर्णाहुति 12 जून को ब्राह्मण भोजन एवं अखंड हरिनाम संकीर्तन के साथ संपन्न होगी। वहीं 13 जून को विशाल भंडारे के आयोजन के साथ इस धार्मिक महोत्सव का समापन किया जाएगा। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक समरसता का प्रतीक बना यह आयोजन इन दिनों पूरे बस्तर अंचल में चर्चा का विषय बना हुआ है।
माओवाद के बाद विकास पर फोकस, 2031 तक बस्तर की तस्वीर बदलने का दावा
सुकमा। माओवाद के प्रभाव में लगातार कमी आने के बाद अब बस्तर में विकास को नई दिशा देने की कवायद तेज हो गई है। जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक स्तर पर क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक विकास रोडमैप तैयार किया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि वर्ष 2031 तक बस्तर को देश के अग्रणी आदिवासी संभागों में शामिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसके लिए सड़क, रेल, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा रही है।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि एक समय जहां क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा थी, वहीं अब विकास को गति देना प्रमुख उद्देश्य बन गया है। इसके लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
बस्तर को देश के अन्य हिस्सों से बेहतर तरीके से जोड़ने के लिए कई महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है। दल्लीराजहरा-जगदलपुर, धमतरी-जगदलपुर और किरंदुल-कोत्तागुडेम रेल परियोजनाएं विकास की दृष्टि से अहम मानी जा रही हैं। वहीं सुकमा को भी प्रस्तावित रेल नेटवर्क से जोड़ने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है। जनजातीय बहुल क्षेत्रों को जोड़ने वाले विशेष रेल और परिवहन कॉरिडोर का प्रस्ताव केंद्र सरकार तक पहुंचाए जाने की जानकारी भी दी गई है।
बैठक के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग-30 की जर्जर स्थिति का मुद्दा भी उठाया गया। बताया गया कि निर्माण लागत में वृद्धि और अन्य तकनीकी कारणों के चलते सड़क उन्नयन के कुछ कार्य प्रभावित हुए हैं। हालांकि अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि बारिश से पहले आवश्यक मरम्मत और पैचवर्क का काम पूरा कर लिया जाएगा, ताकि आवागमन में लोगों को परेशानी न हो।
जनप्रतिनिधियों का दावा है कि आगामी वर्षों में बस्तर परिवहन, पर्यटन और निवेश के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ेगा। बेहतर सड़क और रेल संपर्क, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाओं का विस्तार तथा पर्यटन स्थलों का विकास क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति देगा। उनका मानना है कि यदि प्रस्तावित योजनाएं समयबद्ध तरीके से पूरी होती हैं तो वर्ष 2031 तक बस्तर विकास के नए मॉडल के रूप में उभर सकता है।
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