पटना की आदर्श केंद्रीय कारा, बेउर एक बार फिर गंभीर प्रशासनिक विवादों के घेरे में आ गई है। इस बार विवाद की मुख्य वजह जेल प्रशासन के दो विरोधाभासी आधिकारिक पत्र हैं, जिनकी समय-सीमा और कार्यशैली ने जेल प्रबंधन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा मामले के तहत, एक तरफ जेल अधीक्षक द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में निलंबित अधिकारियों को अपनी-अपनी शाखा का प्रभार सौंपने के लिए बेउर जेल बुलाया गया, वहीं दूसरी तरफ उसी उपस्थिति को आधार बनाते हुए बाद में उन्हीं अधिकारियों के खिलाफ बेउर थाने में संगीन धाराओं में एफआईआर दर्ज करा दी गई।

विवाद की शुरुआत: आधिकारिक पत्र और प्रभार हस्तांतरण
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत उस आधिकारिक पत्र से हुई, जिसे जेल अधीक्षक द्वारा जारी किया गया था। इस पत्र के माध्यम से संबंधित मंडल कारा अधीक्षकों से अनुरोध किया गया था कि वे निलंबित सहायक अधीक्षक अभिषेक कुमार, मनीष कुमार ठाकुर, शालिनी और कुंदन कुमारी को बेउर जेल भेजने की व्यवस्था करें। पत्र में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि नवपदस्थापित अधिकारियों को अब तक विधिवत प्रभार नहीं मिल सका है। इस प्रशासनिक कमी को दूर करने और विभागीय कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए, यह जरूरी था कि संबंधित निलंबित अधिकारियों की उपस्थिति में शाखाओं का चार्ज हैंडओवर कराया जाए। इसी लिखित निर्देश के आधार पर उक्त अधिकारी बेउर जेल पहुंचे और विभागीय प्रक्रिया में शामिल हुए।
दूसरा पहलू: बेउर थाने में एफआईआर और गंभीर आरोप
प्रभार सौंपने की इस प्रक्रिया के कुछ ही समय बाद, दिनांक 28 जुलाई 2026 को जेल अधीक्षक की ओर से बेउर थाना में एक लिखित आवेदन दिया गया। इस आवेदन के आधार पर उपाधीक्षक अजय कुमार सहित अभिषेक कुमार, मनीष कुमार ठाकुर, शालिनी और कुंदन कुमारी के विरुद्ध औपचारिक रूप से एफआईआर दर्ज कर ली गई।
पुलिस को दिए गए आवेदन में जेल प्रशासन की ओर से आरोप लगाया गया कि निलंबन की स्थिति होने के बावजूद इन अधिकारियों ने बिना किसी वैध अनुमति के जेल परिसर में प्रवेश किया। इसके अलावा, उन पर सरकारी अभिलेखों का अवलोकन करने और महत्वपूर्ण दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश करने का भी गंभीर आरोप लगाया गया। प्रशासन का दावा है कि इस कृत्य से जेल की सुरक्षा व्यवस्था और गोपनीय दस्तावेजों की अखंडता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। आवेदन में बिहार कारा हस्तक-2012 के नियमों और प्रावधानों के उल्लंघन का भी विशेष रूप से जिक्र किया गया है।
निलंबित अधिकारियों का पक्ष और प्रशासनिक विरोधाभास
दूसरी ओर, इस एफआईआर में नामजद किए गए सभी निलंबित अधिकारियों ने अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका साफ तौर पर कहना है कि वे किसी भी प्रकार से अनधिकृत तरीके से जेल परिसर में दाखिल नहीं हुए थे। अधिकारियों का पुख्ता दावा है कि वे जेल प्रशासन के अपने ही लिखित आदेश और निर्देश के आधार पर आधिकारिक प्रभार हस्तांतरण की प्रक्रिया को पूरा करने पहुंचे थे।
अधिकारियों का आरोप है कि जेल प्रशासन ने पहले उन्हें खुद विभागीय कार्य के लिए आधिकारिक रूप से बुलाया और जब वे पहुंचे, तो उसी उपस्थिति और प्रवेश को आधार बनाकर उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया गया। उनका यह भी कहना है कि उन्होंने अपने स्तर से कोई भी सरकारी दस्तावेज नहीं देखा और न ही किसी भी अभिलेख के साथ छेड़छाड़ की है।


