अतीश दीपंकर, भागलपुर। जिले में गंगा नदी के बढ़ते जलस्तर ने एक बार फिर विकराल रूप धारण कर लिया है। नदी के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि से निचले इलाकों में बाढ़ की स्थिति बेहद भयावह हो गई है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि गंगा के तटीय इलाकों के कई गांव पूरी तरह से जलमग्न हो चुके हैं, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है और लोगों का पलायन लगातार जारी है।
नाथनगर प्रखंड के कई गांव पानी में डूबे
प्रशासनिक और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, नाथनगर प्रखंड के रत्तीपुर, बैरिया, शंकरपुर, अजमेरीपुर, रसीदपुर और श्रीरामपुर जैसे दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं। इन गांवों के घरों और गलियों में बाढ़ का पानी घुस जाने के बाद स्थानीय ग्रामीणों के सामने रहने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। हालात की गंभीरता को देखते हुए लोग अपने परिवारों और जरूरी सामान को समेटकर सुरक्षित और ऊंचे स्थानों की ओर पलायन करने को विवश हैं।
पांच हजार की आबादी प्रभावित, राहत शिविरों की शरण
इस भयंकर बाढ़ की वजह से प्रभावित इलाकों की करीब पांच हजार की आबादी सीधे तौर पर प्रभावित हुई है। ग्रामीणों का दर्द है कि हर साल मानसून के दौरान बारिश और गंगा के बढ़ते जलस्तर के कारण उन्हें इस तरह की प्राकृतिक त्रासदी का सामना करना पड़ता है, लेकिन इस बार स्थिति समय से पहले ही बद से बदतर हो गई है। बेघर हुए कई परिवारों ने शहर के रविंद्र भवन, टिल्लाह कोठी और अन्य सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर शरण ले रखी है, जहां वे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बारिश और बाढ़ का दोहरा संकट
पीड़ितों की मुश्किलें केवल बाढ़ के पानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लगातार हो रही मानसूनी बारिश ने उनकी परेशानियों को कई गुना बढ़ा दिया है। अस्थायी ठिकानों या खुले आसमान के नीचे शरण लेने वाले परिवारों के लिए बारिश के बीच रात गुजारना और खाना बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि लगातार भीग रहे माहौल और बारिश के कारण चूल्हा तक नहीं जल पा रहा है, जिससे उन्हें मजबूरी में सूखा राशन खाकर ही अपना और अपने बच्चों का पेट भरना पड़ रहा है।


जलावन और पशु चारे का गहराया संकट
इंसानों के खाने के अलावा मवेशियों के सामने भी जीवन का संकट पैदा हो गया है। बाढ़ के कारण जलावन की भारी कमी हो गई है और पशुओं के चारे का संकट भी गहराता जा रहा है। महिलाएं किसी तरह पानी के बीच से संघर्ष करते हुए आसपास के इलाकों से सूखा चारा और घास-फूस जुटाकर अपने मवेशियों का पेट भरने को मजबूर हैं। इसके अलावा, बाढ़ के पानी के साथ आए सांप और अन्य जहरीले जीवों का खतरा भी हर समय बना हुआ है, जिसके कारण ग्रामीण और उनके बच्चे रात के समय भी दहशत के साये में जीने को विवश हैं।
प्रशासन से मदद की गुहार और पानी घटने का इंतजार
आपदा की इस घड़ी में पीड़ित ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि उन्हें तुरंत सुरक्षित स्थान, पका हुआ भोजन, जलावन, पशु चारा और चिकित्सा जैसी जरूरी राहत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। फिलहाल, भय और अनिश्चितता के साए में जी रहे इन ग्रामीणों की एकमात्र उम्मीद अब यही है कि जल्द से जल्द गंगा का जलस्तर कम हो और वे अपने घरों को लौट सकें।



