पटना। ​भोजपुर के चर्चित भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले ने तूल पकड़ लिया है। बिहार पुलिस की कार्यशैली पर उठ रहे सवालों के बीच अब राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने बिहार के मुख्य सचिव, डीजीपी और भोजपुर के एसपी को तलब किया है और चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इस मामले की अगली समीक्षा 13 जुलाई को होगी।

​पुलिस ने मानी अपनी गलती, 5 पुलिसकर्मी निलंबित

​घटना पर स्पष्टीकरण देते हुए ADG सुधांशु कुमार ने स्वीकार किया कि 16 जून को भरत तिवारी के साथ बातचीत करने गए पुलिस अधिकारियों ने स्थिति को ठीक से हैंडल नहीं किया जो एक गंभीर चूक थी। इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार एक SHO, दो SI, एक ASI और एक कॉन्स्टेबल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

​सुप्रीम कोर्ट का रुख और याचिका की मांग

​इधर इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी हलचल तेज है। अधिवक्ता विशाल तिवारी ने जनहित याचिका (PIL) दायर कर इस एनकाउंटर को फर्जी करार दिया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि पुलिस अक्सर आत्मरक्षा का एक ही रटा-रटाया नैरेटिव पेश करती है। याचिकाकर्ता ने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए इसे CBI को सौंपने और सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज की निगरानी में एक स्वतंत्र समिति बनाने की मांग की है।
​हालांकि जस्टिस नागरत्ना की बेंच ने फिलहाल इस मामले पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है और अधिवक्ता को रजिस्ट्रार के समक्ष मेंशन करने का निर्देश दिया है।

​राजनीतिक हलचल और न्यायिक जांच की स्थिति

​एनकाउंटर के बाद से ही पीड़ित परिवार को समर्थन देने का सिलसिला जारी है। हाल ही में अभिनेता खेसारी लाल यादव और भोजपुरी गायक गुंजन सिंह ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठाए। आरजेडी का एक प्रतिनिधिमंडल भी परिजनों से मिला है।
​विवादों के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घटना के 5 दिन बाद मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए थे और कहा था कि हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज से इसकी जांच कराई जाएगी। हालांकि इस घोषणा के 48 घंटे बीत जाने के बाद भी जांच अधिकारी की नियुक्ति को लेकर कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है जिससे प्रशासनिक कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग लगातार तेज हो रही है।