Bihar Floods: बिहार में बाढ़ का संकट लगातार गहराता जा रहा है। राज्य के 13 जिले इस समय बाढ़ की चपेट में हैं। राजधानी पटना में गंगा और पुनपुन नदी के बढ़ते जलस्तर ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। गांधी घाट पर गंगा ने 10 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है, जबकि पुनपुन खतरे के निशान से करीब 2.75 मीटर ऊपर बह रही है। दूसरी ओर, हाजीपुर में गंडक के दबाव में बीती रात 25 फीट ऊंचा रिंग बांध टूटने से करीब 500 घरों में पानी घुस गया है।

लगातार बिगड़ते हालात के बीच कई इलाकों में लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं और प्रशासन के सामने बाढ़ से निपटने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। इस बीच लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने बाढ़ की स्थिति को लेकर सम्राट सरकार पर जमकर निशाना साधा है।

रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया एक्स पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट शेयर करते हुए लिखा कि, बाढ़ आने के पहले कुंभकर्णी निद्रा में सोयी रहती है बिहार की सरकार..। रोहिणी ने कहा कि, बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ एक ज्ञात और नियमित आपदा है, लेकिन बावजूद इसके सरकार, आपदा प्रबंधन विभाग, शासन और प्रशासन की कार्यशैली समस्या के स्थायी समाधान की बजाय आपदा आने के बाद ही महज खानापूर्ति करने की कवायद में सक्रिय होती है। हवाई सर्वेक्षणों, दिखावे की समीक्षा बैठकों एवं कोरी बयानबाजी का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है।

रोहिणी आचार्य ने कहा कि, बिहार का लगभग दो-तिहाई चिन्हित हिस्सा बाढ़ और बाढ़ की वजह से होने वाले कटाव के मद्देनजर संवेदनशील है और हर साल जुलाई-अगस्त-सितंबर के महीनों में उत्तरी, मध्य और पूर्वी बिहार के दो दर्जन से अधिक जिले जलमग्न होते हैं। इसके बावजूद बिना किसी माकूल पूर्व की तैयारी के सरकारी अमला और आपदा प्रबंधन विभाग हर वर्ष बाढ़ के पानी में बस्तियों के डूबने और कटने का इंतजार करते हैं। जलभराव के बाद ही सरकार की नींद खुलना साफ़ तौर पर शासन की गंभीर लापरवाही है।

उन्होंने कहा कि, बाढ़ नियंत्रण और कटाव से बचाव के नाम पर हर साल अरबों रूपयों का आवंटन होता है , लेकिन तटबंधों (Embankments) की मरम्मत, गाद हटाने (Dredging), जल निकासी एवं पुनर्वास व् राहत की व्यवस्था सरकारी फाईलों में ही सिमट कर रह जाती है। तटबंधों का समय से पहले ऑडिट न होना, कटाव रोकने के लिए ठोस कार्रवाई न होना सरकारी योजना तंत्र की विफलता है।

रोहिणी आचार्य ने कहा कि, बीस वर्षों से ऊपर के शासनकाल में भी स्थायी विस्थापन नीति, नदियों के अंतर-संयोजन और नेपाल के साथ कूटनीतिक स्तर पर जल प्रबंधन की मजबूत नीति बनाने में एनडीए की सरकार विफल रही है। आपदा प्रबंधन विभाग का काम आपदा के प्रभाव को कम करना होना चाहिए, न कि केवल बाढ़ आने के बाद सक्रिय दिखना । यथोचित पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early वार्निंग System) विकसित करने और ग्रामीण स्तर पर सुरक्षित आश्रय – पुर्नवास स्थलों का निर्माण किए जाने के फ्रंट पर भी एनडीए की सरकार पूरी तरह फेल ही साबित हुई है ।

उन्होंने कहा कि, जब तक बिहार सरकार बाढ़ को एक ‘आकस्मिक घटना’ की बजाय ‘वार्षिक संकट’ मानकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, ईमानदारी, मजबूत इच्छाशक्ति और भ्रष्टाचार मुक्त प्रणाली के साथ स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यवस्था का निर्माण नहीं करेगी, तब तक हर साल राज्य की एक बड़ी आबादी को बाढ़ की तबाही का शिकार होना ही पड़ेगा।

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