दिलशाद अहमद, सूरजपुर। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में अवैध अतिक्रमण के खिलाफ प्रशासन की बड़ी कार्रवाई देखने को मिली है। प्रेमनगर के महेशपुर जंगल में वन विभाग की शासकीय भूमि पर 25 पंडो जनजाति परिवारों ने लकड़ी से मकान बना रखा था, जिसे जिला प्रशासन, राजस्व विभाग, वन विकास निगम और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में हटाने के लिए बुलडोजर चलाया गया।

प्रशासन का दावा

प्रशासन का दावा है कि इन परिवारों को पिछले कई महीनों में 5 से 6 बार नोटिस के साथ समझाइश भी दी गई, लेकिन अतिक्रमण नहीं हटाया गया। अधिकारियों के मुताबिक पहले भी दो बार कार्रवाई की कोशिश हुई थी, लेकिन विरोध के कारण अभियान पूरा नहीं हो सका। इस बार पूरे प्रशासनिक अमले की मौजूदगी में सरकारी जमीन खाली कराने की कार्रवाई की गई।

नियमों के तहत की गई कार्रवाई- प्रशासन

प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत की गई है। अभी मानसून पूरी तरह सक्रिय नहीं हुआ है, इसलिए अभियान चलाया गया। उनका कहना है कि अगर लगातार बारिश हो रही होती तो मानवीय आधार पर कार्रवाई टाल दी जाती। प्रशासन यह भी दावा कर रहा है कि प्रभावित परिवार मूल रूप से दूसरे स्थानों के रहने वाले हैं और उन्हें अपने गांव लौटने के लिए कहा गया है।

प्रभावित लोगों का आरोप

इतना ही नहीं घरेलू सामान को सुरक्षित पहुंचाने के लिए वन विकास निगम के वाहनों की व्यवस्था भी की गई है, लेकिन दूसरी तरफ मौके से सामने आई तस्वीरें प्रशासन के दावों पर कई सवाल खड़े कर रही हैं। बुलडोजर चलते ही महिलाएं रोती नजर आईं, बच्चे खुले आसमान के नीचे खड़े रहे और परिवार अपने टूटे हुए आशियाने का सामान समेटते दिखाई दिए। प्रभावित लोगों का आरोप है कि घर तोड़ने से पहले उनके रहने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई और अब बरसात के मौसम में उनके सामने सबसे बड़ा संकट सिर छुपाने का खड़ा हो गया है।

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कांग्रेस नेता ने साधा निशाना

महेशपुर जंगल में चली इस कार्रवाई ने अब सिर्फ अतिक्रमण का मुद्दा नहीं छोड़ा, बल्कि प्रशासन की कार्यशैली पर भी बहस छेड़ दी है। इसको लेकर कांग्रेस नेता नरेश राजवाड़े ने कहा कि जिस तरह से बरसात में अतिक्रमण हटाया जा रहा है आदिवासी मुख्यमंत्री होते हुए राषट्रपति के दत्ताक पुत्र को बेदख़ल किया जा रहा है। पंडो समाज के लोग खुद को बेघर और बेसहारा बता रहे हैं और उनका कहना है कि पंडो जाती में हम पैदा ही क्यों हुए।

खड़े हुए कई सवाल

सवाल यह है कि अगर यह अतिक्रमण वर्षों पुराना था तो कार्रवाई ठीक मानसून की दहलीज पर ही क्यों हुई, क्या पुनर्वास की व्यवस्था पहले नहीं की जा सकती थी? क्या कानून का पालन सिर्फ बुलडोजर चलाकर ही पूरा हो जाता है या फिर प्रभावित परिवारों की सुरक्षा और मानवीय जिम्मेदारी भी शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

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