पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति का विवाद कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है. पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए हैं. अदालत ने पूछा कि यदि एक ही राजनीतिक दल की ओर से दो अलग-अलग प्रस्ताव मिलें तो अध्यक्ष को क्या प्रक्रिया अपनानी चाहिए और क्या बिना संबंधित पक्षों को सुने निर्णय लिया जा सकता है.
कलकत्ता हाईकोर्ट ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कृष्ण राव ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से कई सवाल पूछे.
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर चल रहे विवाद पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने अहम सवाल खड़े किए है. अदालत ने पूछा है कि यदि किसी एक राजनीतिक दल की ओर से नेता प्रतिपक्ष के लिए दो अलग-अलग प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को प्राप्त होते हैं, तो ऐसी स्थिति में उन्हें किस प्रक्रिया का पालन करना चाहिए.

पश्चिम बंगाल विधानसभा में इस तरह का विवाद पहली बार अदालत के समक्ष आया है. शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कृष्ण राव ने कहा कि अध्यक्ष को सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी से प्रस्ताव मिलने के बाद कार्रवाई करनी होती है, लेकिन उन्हें ऐसे प्रस्तावों से पैदा होने वाले विवादों का समाधान भी कानून के अनुसार करना चाहिए.
TMC की तरफ से दो नाम, एक नाम पार्टी के बागी विधायकों ने और दूसरा नाम पार्टी नेतृत्व की तरफ से विधानसभा अध्यक्ष को भेजा गया. जिसके बाद बागी गुट की ओर से भेजे गए ऋतब्रत बनर्जी के नाम का प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने स्वीकार कर लिया.

कलकत्ता हाईकोर्ट ने आगे पूछा कि अगर दो अलग-अलग प्रस्ताव एक ही राजनीतिक दल से मिलते है तो, इस अवस्था में विधानसभा अध्यक्ष को कौन सी प्रक्रिया अपनानी होती है और उनका कर्तव्य क्या होगा? क्या वह दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर दिए बिना स्वतः निर्णय ले सकते है?
कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी. याचिकाकर्ता ने अपने नाम को अस्वीकार किए जाने और पार्टी के ही अन्य विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने को चुनौती दी है.
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