चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने चंडीगढ़ गोल्फ क्लब को एक बड़ा झटका देते हुए उसे सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाने का फैसला सुनाया है। अदालत ने क्लब की याचिका को खारिज करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग के 2012 के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें गोल्फ क्लब को एक पब्लिक अथॉरिटी (जनप्राधिकरण) घोषित किया गया था। हाई कोर्ट ने क्लब को एक महीने के भीतर आरटीआई एक्ट के तहत जानकारी प्रदान करने के लिए आवश्यक व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं।
14 साल पुरानी कानूनी लड़ाई का अंत
यह मामला पिछले लगभग 14 वर्षों से कानूनी प्रक्रिया में उलझा हुआ था। साल 2012 में केंद्रीय सूचना आयोग ने फैसला सुनाया था कि चंडीगढ़ गोल्फ क्लब को सरकार की ओर से काफी जमीन, रियायतें और अन्य वित्तीय लाभ प्राप्त होते हैं, जिसके चलते यह आरटीआई एक्ट के तहत एक पब्लिक अथॉरिटी के दायरे में आता है। गोल्फ क्लब प्रबंधन ने सीआईसी के इस फैसले को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाई कोर्ट ने क्लब की इस दलील और याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
एक महीने के भीतर आरटीआई लागू करने के आदेश
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने मामले की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को स्पष्ट किया कि चंडीगढ़ गोल्फ क्लब को अब पारदर्शिता और जवाबदेही के नियमों का पालन करना ही होगा। अदालत ने माना कि भले ही क्लब को सीधे तौर पर कोई नकद सरकारी फंड नहीं मिलता हो, लेकिन यह बेशकीमती सरकारी जमीन और अन्य सरकारी सुविधाओं का पूरा लाभ उठाता है। इसलिए, क्लब को आरटीआई अधिनियम से छूट नहीं दी जा सकती।

नियुक्त करना होगा लोक सूचना अधिकारी
हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब न केवल गोल्फ क्लब के सदस्य बल्कि देश का कोई भी आम नागरिक आरटीआई लगाकर क्लब से जुड़ी जानकारियां हासिल कर सकेगा। अब क्लब का प्रशासन, वित्तीय प्रबंधन, मेंबरशिप के नियम, वीआईपी कोटे, दैनिक खर्चे और सार्वजनिक महत्व से जुड़े फैसलों की फाइलें आरटीआई के जरिए जनता के सामने आ सकेंगी। इसके लिए क्लब को अनिवार्य रूप से एक लोक सूचना अधिकारी (PIO) नियुक्त करना होगा, जो आरटीआई एक्ट के तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदकों को जवाब देने के लिए उत्तरदायी होगा।
क्यों उठ रही थी पारदर्शिता की मांग?
चंडीगढ़ गोल्फ क्लब में पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से मांग उठ रही थी। खुद क्लब के कई सदस्यों ने प्रबंधन के प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की कमी पर चिंता व्यक्त की थी। अब तक आरटीआई के दायरे से बाहर होने के कारण सदस्यता आवंटन, भारी-भरकम खर्चों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक नहीं हो पाती थीं, जो सालों से विवाद और कानूनी लड़ाइयों का मुख्य कारण बना हुआ था।
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