अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। डोंगरगढ़ वाली मां बम्लेश्वरी के नाम और इतिहास को लेकर शुरू हुई नई बहस ने डोंगरगढ़ की पुरानी धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक दस्तावेजों को फिर सामने ला दिया है। विवाद की शुरुआत कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा के नाम से सामने आए उस कथित कथन से हुई, जिसमें देवी के नाम को भगवान शिव के डमरू से निकली ‘बम’ ध्वनि से जोड़ा गया।
यह भी पढ़ें : बढ़े स्वाइन फ्लू के मरीज, जिला अस्पताल में बनाया गया 10 बेड का आइसोलेशन वार्ड…
गोंड समाज ने इसे अपनी परंपरा के विपरीत बताते हुए राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर खंडन, स्पष्टीकरण और माफी की मांग की है। गोंड समाज की मान्यता है कि डोंगरगढ़ की देवी को पुरानी परंपरा में ‘दाई बमलाई’ कहा जाता था, और बाद में ‘बम्लेश्वरी’ नाम प्रचलित हुआ।

समाज इससे जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों का उल्लेख करता है और डॉ. मोतीरावण कंगाली की पुस्तक ‘डोंगरगढ़ की बमलाई दाई बमलेश्वरी’ को भी इसका महत्वपूर्ण आधार मानता है। गोंड समाज के अनुसार यह केवल देवी के नाम का सवाल नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और पुरानी परंपरा से जुड़ा विषय है। हालांकि, इन दावों की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए प्राथमिक दस्तावेजों की जरूरत होगी।

दूसरी तरफ करीब डेढ़ सौ साल पुराने ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड में एक अलग नाम सामने आता है। अलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट में 1864 के डोंगरगढ़ का उल्लेख करते हुए बगलामुखी देवी के सम्मान में रविवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार की जानकारी दर्ज है। यानी उस दौर के उपलब्ध लिखित रिकॉर्ड में देवी का संदर्भ बगलामुखी नाम से मिलता है। यह रिकॉर्ड महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि बगलामुखी से बमलाई और फिर बम्लेश्वरी नाम कैसे बना।

वर्तमान में मंदिर की आधिकारिक पहचान मां बम्लेश्वरी के रूप में है। मंदिर की वेबसाइट भी पहाड़ी स्थित मंदिर को मां बम्लेश्वरी और नीचे स्थित मंदिर को छोटी बम्लेश्वरी के रूप में दर्ज करती है। ऐसे में सामने तीन अलग-अलग संदर्भ हैं, ऐतिहासिक रिकॉर्ड में बगलामुखी, गोंड समाज की परंपरा में दाई बमलाई और वर्तमान धार्मिक व्यवस्था में बम्लेश्वरी। इन नामों को एक-दूसरे से जोड़ने वाले प्रमाणित दस्तावेज सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है।
आखिर सच क्या है? क्या बगलामुखी, बमलाई और बम्लेश्वरी एक ही देवी के अलग-अलग समय में प्रचलित नाम हैं, या इनके पीछे अलग परंपराओं की कहानी है? इसका जवाब किसी एक कथा या दावे से नहीं, बल्कि पुराने राजकीय दस्तावेजों, मंदिर के अभिलेखों, पुरातात्विक प्रमाणों और गोंड समाज की मौखिक परंपराओं को एक साथ रखकर तलाशना होगा।
फिलहाल, इतना जरूर है कि उपलब्ध इतिहास, लोकपरंपरा और वर्तमान धार्मिक पहचान तीनों की कहानियां पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं और इसी वजह से डोंगरगढ़ की देवी के नाम को लेकर बहस फिर तेज हो गई है।
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m



