नूंह में एक बहू ने अपनी चलने-फिरने में असमर्थ 90 वर्षीय सास को टोकरे में बिठाकर 84 कोस की परिक्रमा कराई है। इस सेवा भाव की हर तरफ चर्चा हो रही है।

सोनू वर्मा, नूंह। सास-बहू के रिश्तों को लेकर अक्सर अनबन और विवाद की खबरें सुनने को मिलती हैं, लेकिन नूंह से एक ऐसी कहानी सामने आई है जिसने सभी का दिल जीत लिया है। एक बहू ने अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को अपने सिर पर टोकरे में बैठाकर 84 कोस की कठिन परिक्रमा पूरी कराई है। काजल चौधरी नाम की इस बहू ने अपनी सेवा, समर्पण और संस्कारों की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी हर ओर चर्चा हो रही है। सास की धार्मिक आस्था और परिक्रमा करने की गहरी इच्छा को पूरा करने के लिए काजल ने कठिन सफर की परवाह नहीं की और पूरे रास्ते उनकी हर जरूरत का ध्यान रखा। यह सेवा भाव समाज के लिए एक बड़ा संदेश है।

बहू के जज्बे को मिला सम्मान

जब यह परिक्रमा यात्रा बिछोर गांव पहुंची, तो वहां के लोगों ने बहू के इस समर्पण को देखकर उसका भव्य स्वागत किया। मुस्लिम समाज के पुरुषों और महिलाओं ने काजल चौधरी की हौसला अफजाही करते हुए उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया। ग्रामीणों ने कहा कि आज के दौर में जब रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं, तब काजल जैसी बहुएं समाज के लिए असली प्रेरणा हैं, जो सास-ससुर को माता-पिता के समान सम्मान देती हैं। बिछोर गांव के लोगों द्वारा मिले इस मान-सम्मान से काजल काफी भावुक नजर आईं और उन्होंने इसे अपने लिए अमूल्य बताया। उन्होंने परिक्रमा के दौरान अपने सास की हर छोटी-बड़ी जरूरत को अपना फर्ज समझकर पूरा किया।

सास भी मां के समान होती है

काजल चौधरी ने बताया कि उन्होंने अपनी परिक्रमा बंचारी गांव से शुरू की थी। उनकी 90 वर्षीय सास चंदरी चलने-फिरने में असमर्थ हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें टोकरे में बिठाकर सफर तय करने का निर्णय लिया। काजल का कहना है कि सास भी मां ही होती है और प्रेम, सेवा व संस्कारों से किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाया जा सकता है। उनका यह कार्य केवल एक पारिवारिक उदाहरण नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों का एक सशक्त संदेश भी है। काजल की इस निष्ठा और सेवा ने साबित कर दिया है कि यदि भावना सच्ची हो, तो कठिन से कठिन सफर भी आसान हो जाता है। उनकी यह कहानी अब सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही है।