दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने राजधानी में वर्ष 2015 में हुए एक सड़क हादसे से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फुटपाथ पर सो रहे लोगों को तेज रफ्तार ट्रक से कुचलने की घटना में पूरी लापरवाही ट्रक चालक की थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सड़क किनारे या फुटपाथ पर सो रहे लोगों को दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे मामलों में वाहन चालक का दायित्व है कि वह पूरी सतर्कता और सावधानी के साथ वाहन चलाए, ताकि किसी भी व्यक्ति की जान खतरे में न पड़े।
फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए है, वाहनों के लिए नहीं
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फुटपाथ का उद्देश्य पैदल चलने वालों और जरूरत पड़ने पर लोगों के आराम करने के लिए है, न कि वहां वाहन चलाने के लिए। अदालत ने माना कि फुटपाथ पर सो रहे लोगों को हादसे के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और इस मामले में पूरी लापरवाही ट्रक चालक की थी। हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवारों को राहत देते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) द्वारा मुआवजे में की गई कटौती को अनुचित माना। अदालत ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाकर लगभग ₹10 लाख कर दी।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला अक्टूबर 2015 में दिल्ली के मादीपुर मेट्रो स्टेशन के नीचे हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़ा है। घटना के दौरान एक तेज रफ्तार ट्रक फुटपाथ पर चढ़ गया और वहां सो रहे दिगंबर कुमार, लेख राज, अनिल बेदी और रमेश चंद को कुचल दिया। इस हादसे में अनिल बेदी और रमेश चंद की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दिगंबर कुमार और लेख राज गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद पीड़ित परिवारों ने मुआवजे के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) का रुख किया।
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने दलील दी कि फुटपाथ पर सोना भी दुर्घटना का एक कारण था। ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए पीड़ितों की 50 प्रतिशत योगदानात्मक लापरवाही (Contributory Negligence) मान ली और मुआवजे की राशि में 50 % की कटौती कर दी। हालांकि, अब दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि फुटपाथ पैदल चलने वालों और जरूरत पड़ने पर उनके आराम करने के लिए होता है, वाहनों के लिए नहीं। इसलिए फुटपाथ पर सो रहे लोगों को इस हादसे के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला क्यों पलटा?
मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस अनीश दयाल की पीठ ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल को सबसे पहले यह विचार करना चाहिए था कि क्या ट्रक चालक को फुटपाथ पर वाहन चढ़ाने का कोई कानूनी अधिकार था? यदि नहीं, तो फुटपाथ पर मौजूद लोगों को दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में देश की सामाजिक और जमीनी परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि बेघर लोग और दिहाड़ी मजदूर अक्सर मजबूरी में फुटपाथ पर आराम करते हैं, क्योंकि उनके पास रहने या सोने के लिए कोई सुरक्षित विकल्प नहीं होता। ऐसे लोगों को यह उम्मीद नहीं होती कि कोई वाहन फुटपाथ पर चढ़ जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फुटपाथ पर सोना भले ही जोखिम भरा हो, लेकिन इसे कानून की नजर में पीड़ितों की लापरवाही नहीं माना जा सकता। दुर्घटना की पूरी जिम्मेदारी उस चालक की है, जिसने वाहन को फुटपाथ पर चढ़ाकर लोगों की जान जोखिम में डाली।
हाई कोर्ट से पीड़ित परिवारों को बड़ी राहत
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि फुटपाथ पर वाहन चलाना कानूनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। अदालत ने कहा कि यदि कोई चालक पैदल यात्रियों के लिए आरक्षित स्थान पर वाहन चढ़ाता है और उससे कोई दुर्घटना होती है, तो उसकी 100 प्रतिशत जिम्मेदारी उसी चालक की होगी। हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) द्वारा पीड़ितों की 50 प्रतिशत योगदानात्मक लापरवाही मानकर मुआवजे में की गई कटौती उचित नहीं थी। अदालत ने ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष को पूरी तरह खारिज करते हुए कटौती को समाप्त कर दिया। अदालत ने कहा कि फुटपाथ पैदल चलने वालों की सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैं और वहां मौजूद लोगों को दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए ट्रक चालक की लापरवाही ही हादसे का एकमात्र कारण थी। हाई कोर्ट ने मृतकों के परिजनों को राहत देते हुए बढ़े हुए मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया।
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