दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी लोक सेवक द्वारा धन प्राप्त करना अपने आप में रिश्वत नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह ठोस रूप से सिद्ध न हो जाए कि उक्त धन किसी अवैध सरकारी लाभ पहुंचाने या पक्षपात के बदले लिया गया था, तब तक इसे रिश्वत नहीं कहा जा सकता। उच्च न्यायालय ने अपने अवलोकन में कहा कि केवल धन की बरामदगी या प्राप्ति पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना होगा कि धन का लेन-देन किसी भ्रष्ट उद्देश्य से जुड़ा हुआ था।
केन्द्रीय भंडारण निगम (CWC) के एक अधिकारी को सेवा से हटाने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर भ्रष्टाचार के आरोप टिकाऊ नहीं हैं।मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी लोक सेवक द्वारा धन प्राप्त करना अपने आप में रिश्वत नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो जाए कि वह राशि किसी अवैध सरकारी लाभ या पक्षपात के बदले ली गई थी। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही संबंधित अधिकारी ने धन के संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण न दिया हो, फिर भी केवल इसी आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
3 आरोपों के बाद नौकरी से हटा दिया
अदालत ने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर भ्रष्टाचार के आरोप टिकाऊ नहीं हैं। मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता CWC में वरिष्ठ सहायक प्रबंधक के पद पर कार्यरत था। उस पर तीन प्रमुख आरोप लगाए गए थेअवैध रिश्वत लेना, कार्य में लापरवाही बरतना और दुराचरण करना। विभागीय कार्यवाही के बाद इन आरोपों के आधार पर उसे सेवा से हटा दिया गया था।सबसे गंभीर आरोप यह था कि अधिकारी ने गोदाम से माल उठाने वाले पक्षों से अवैध धनराशि प्राप्त की। साथ ही, एक व्यापारी से 75 हजार रुपये अपने बैंक खाते में लेने का भी आरोप लगाया गया था। जांच के दौरान कुछ आरोपों के हिस्सों को सही माना गया, जिसके बाद विभागीय प्राधिकारी ने रिश्वत के आरोप को स्थापित मानते हुए अधिकारी को सेवा से हटाने की सजा दी। अपीलीय स्तर पर भी इस निर्णय को बरकरार रखा गया।
यह साबित नहीं होता कि यह घूस की रकम
हालांकि, उच्च न्यायालय ने पाया कि रिश्वत का निष्कर्ष मुख्य रूप से अधिकारी के खाते में 75 हजार रुपये ट्रांसफर होने के आधार पर निकाला गया था। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों के पास ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि यह राशि किसी अवैध लाभ पहुंचाने के बदले दी गई थी।
मामले में याचिकाकर्ता पर अवैध रिश्वत लेने, ड्यूटी में लापरवाही और दुराचरण के आरोप लगाए गए थे। विभागीय जांच के बाद उसे सेवा से हटा दिया गया था, जिसे अपीलीय स्तर पर भी बरकरार रखा गया था। सबसे गंभीर आरोप अधिकारी के खाते में 75 हजार रुपये ट्रांसफर होने को लेकर था, जिसे रिश्वत माना गया। हालांकि, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल धन प्राप्ति के आधार पर रिश्वत का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि राशि किसी अवैध लाभ या पक्षपात के बदले दी गई थी। अदालत ने पाया कि इस संबंध में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
अन्य आरोपों पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि ड्यूटी के दौरान सोने का आरोप भी निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हो पाया, क्योंकि रिकॉर्ड में परस्पर विरोधी विवरण मौजूद थे। वहीं मुख्यालय छोड़ने और तौल केन्द्र पर अस्थायी कर्मचारी नियुक्त करने जैसे आरोप अधिकतम सीमित प्रशासनिक लापरवाही के दायरे में आते हैं।अदालत ने कहा कि जब भ्रष्टाचार का मुख्य आरोप ही साबित नहीं हो सका, तब शेष आरोप इतने गंभीर नहीं हैं कि सेवा से हटाने जैसी कठोर सजा को उचित ठहराया जा सके।
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