Delhi First Bird Atlas: देश की राजधानी दिल्ली केवल राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र ही नहीं, बल्कि पक्षियों की असाधारण विविधता के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थान मानी जाती है। दुनिया की राजधानियों में पक्षी प्रजातियों की समृद्धि के मामले में दिल्ली को दूसरा स्थान दिया जाता है। इसके बावजूद अब तक यह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी कि शहर के किस हिस्से में कौन-सी पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। इसी कमी को दूर करते हुए दिल्ली का पहला ‘बर्ड एटलस’ तैयार किया गया है, शुरुआती वर्ष के सर्वेक्षण में कुल 221 पक्षी प्रजातियों की पहचान और रिकॉर्डिंग की गई है। यह अध्ययन शहर की जैव विविधता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है।
दो वर्षों में तैयार हुआ दिल्ली का पहला ‘पक्षी मानचित्र’
यह परियोजना दिल्ली सरकार के वन विभाग और बर्ड काउंट इंडिया (Bird Count India) के संयुक्त प्रयास से तैयार की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य राजधानी में पक्षियों के वितरण, उनकी संख्या और उनके आवास स्थलों से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से संकलित करना है। जानकारी के अनुसार, इस पक्षी मानचित्र में दिल्ली के विभिन्न इलाकों में पाई जाने वाली पक्षी प्रजातियों का विस्तृत रिकॉर्ड शामिल किया गया है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन-सी प्रजातियां किस क्षेत्र में अधिक पाई जाती हैं और उनके प्राकृतिक आवास किस प्रकार बदल रहे हैं। इस एटलस का औपचारिक लोकार्पण विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह द्वारा किया गया।
वैज्ञानिक तरीके से हुआ सर्वे
पक्षी मानचित्र (Bird Atlas) को अधिक सटीक और वैज्ञानिक बनाने के लिए पूरे शहर को एक विशेष ग्रिड प्रणाली में विभाजित किया गया। इसके तहत दिल्ली क्षेत्र को 6.6 वर्ग किलोमीटर के ग्रिड में बांटकर विस्तृत अध्ययन किया गया। प्रत्येक ग्रिड को आगे छोटे-छोटे उपक्षेत्रों में विभाजित किया गया और चयनित स्थानों पर गहन सर्वेक्षण किया गया। इस प्रक्रिया के तहत कुल 145 उपक्षेत्रों में पक्षी विविधता का अध्ययन किया गया, जो राजधानी के लगभग 11% भूभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
195 प्रतिभागियों ने संभाली जिम्मेदारी
2 से 5 सदस्यों वाली टीमों ने विभिन्न मौसमों में क्षेत्रीय निरीक्षण किए। इस दौरान सर्दियों और गर्मियों में कुल 4 चरणों में विस्तृत सर्वेक्षण किया गया, ताकि स्थानीय और प्रवासी दोनों प्रकार की पक्षी प्रजातियों की उपस्थिति को दर्ज किया जा सके। अधिकारियों के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में कुल 195 प्रतिभागियों ने योगदान दिया। इन प्रतिभागियों ने दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर पक्षियों की पहचान, उनकी गतिविधियों और उनके आवास से जुड़ा डेटा एकत्र किया।
रिकॉर्ड में दर्ज हुईं 221 प्रजातियां
एटलस के शुरुआती वर्ष के सर्वेक्षण में कुल 221 पक्षी प्रजातियों की पहचान और रिकॉर्डिंग की गई है। यह अध्ययन शहर की जैव विविधता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है। सर्वेक्षण के अनुसार, सबसे अधिक संख्या कीटभक्षी पक्षियों की पाई गई, जिनकी 108 प्रजातियां दर्ज की गईं। यह दर्शाता है कि दिल्ली का पारिस्थितिक तंत्र अभी भी बड़ी संख्या में कीट-आधारित खाद्य श्रृंखला को सहारा देता है। इसके अलावा, 37 प्रजातियां ऐसी पाई गईं जो मुख्य रूप से बीज और वनस्पतियों पर निर्भर हैं, जबकि 34 प्रजातियां सर्वाहारी श्रेणी में शामिल रहीं, जो विभिन्न प्रकार के भोजन स्रोतों पर निर्भर करती हैं। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि छोटे जीवों और मृत पशुओं पर निर्भर रहने वाली 33 पक्षी प्रजातियां भी राजधानी में मौजूद हैं। वहीं, फल और फूलों के रस पर निर्भर पक्षियों की संख्या सबसे कम रही, और ऐसी केवल 9 प्रजातियां ही दर्ज की गईं।
संकटग्रस्त और दुर्लभ पक्षियों की मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता और उम्मीद
सर्वेक्षण में ब्लैक-बेलीड टर्न (Black-bellied Tern) जैसी संकटग्रस्त प्रजाति के अलावा कई निकट संकटग्रस्त (Near Threatened) पक्षियों की भी मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें ओरिएंटल डार्टर, एशियाई वूली-नेक्ड स्टॉर्क, ब्लैक-हेडेड आइबिस और पेंटेड स्टॉर्क जैसी प्रजातियां शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन दुर्लभ और संवेदनशील प्रजातियों की राजधानी में उपस्थिति यह संकेत देती है कि दिल्ली का पारिस्थितिकी तंत्र केवल शहरी क्षेत्र नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण जैव विविधता स्थल भी है। पर्यावरणविदों के अनुसार, इन प्रजातियों का मौजूद रहना इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली में अभी भी कुछ ऐसे प्राकृतिक आवास मौजूद हैं, जो प्रवासी और स्थानीय दोनों प्रकार के पक्षियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करते हैं।
यमुना के बाढ़ क्षेत्र और अरावली बने पक्षी विविधता के बड़े केंद्र
विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली क्षेत्र, यमुना का बाढ़ मैदान, साहिबी नदी के आसपास के इलाके और सेंट्रल एशियन फ्लाइवे जैसे प्राकृतिक कारक दिल्ली को पक्षियों के लिए अत्यंत अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। इन्हीं परिस्थितियों के कारण राजधानी में वर्षभर बड़ी संख्या में स्थानीय और प्रवासी पक्षी देखे जाते हैं। यमुना के किनारे और आर्द्रभूमि क्षेत्रों में कई प्रवासी प्रजातियां मौसमी रूप से आती हैं, जबकि अरावली क्षेत्र और शहरी हरित क्षेत्र स्थानीय पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं।
नीति निर्माण से लेकर संरक्षण तक, कई क्षेत्रों में होगा एटलस का उपयोग
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने राजधानी में तैयार किए गए पहले पक्षी मानचित्र (Bird Atlas) को केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि भविष्य की नीति-निर्माण प्रक्रिया के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बताया है। उन्होंने कहा कि यह एटलस दिल्ली की जैव विविधता को समझने का वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है और इसके माध्यम से पक्षियों के वितरण तथा उनकी मौसमी गतिविधियों का विस्तृत अध्ययन संभव हुआ है। यह जानकारी आवास पुनर्स्थापन (Habitat Restoration), पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ शहरी विकास की योजनाओं को दिशा देने में मदद करेगी। पर्यावरण मंत्री के अनुसार, इस तरह के वैज्ञानिक दस्तावेज नीति-निर्माताओं को यह समझने में सहायता करते हैं कि किन क्षेत्रों में हरित आवरण को मजबूत करने और प्राकृतिक आवासों को संरक्षित करने की आवश्यकता है। इससे शहर के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।
अन्य जीव-जंतुओं पर भी ऐसे अध्ययन की जरूरत
इसी क्रम में अब अन्य जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के व्यापक अध्ययन की आवश्यकता पर भी जोर दिया जा रहा है। पंकज गुप्ता ने कहा कि दिल्ली सरकार द्वारा राज्य स्तर पर पक्षियों के वितरण का इस तरह का विस्तृत डेटा पहली बार तैयार किया गया है। उनके अनुसार, यह कदम शहरी जैव विविधता को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसी तरह के व्यापक और वैज्ञानिक सर्वेक्षण अन्य वन्यजीवों, पौधों और कीटों के लिए भी किए जाने चाहिए। इससे राजधानी की संपूर्ण जैव विविधता का एक समग्र वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार किया जा सकेगा, जो भविष्य की पर्यावरणीय नीतियों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।
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