इमरान खान, खंडवा। प्रशासन के ‘द्वार’ पर न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचे किसानों को हताशा के अलावा जेल की हवा खानी पड़ गई। मंगलवार को कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित जनसुनवाई में अपनी पीड़ा बताने आए ग्राम बरूड़ के दो किसानों को राहत तो नहीं मिली, उल्टा उन्हें हथकड़ी लगाकर जेल भेज दिया गया। किसानों का कसूर सिर्फ इतना था कि वे पिछले तीन साल से अपने खेत तक जाने वाले रास्ते को खुलवाने के लिए अपनी बात मजबूती से रख रहे थे।

जनसुनवाई में उम्मीद टूटी तो छलका किसानों का दर्द

छैगांवमाखन तहसील के ग्राम बरूड़ से आए किसान रामनारायण मौजीलाल और श्याम रामनारायण की कहानी किसी का भी दिल दहला सकती है। किसानों ने बताया कि उनकी 8 एकड़ सिंचित जमीन पिछले तीन साल से बंजर पड़ी है क्योंकि रसूखदारों ने खेत की रजिस्ट्री में दर्ज पुराने रास्ते को बंद कर दिया है। उन्होंने बताया कि किसान तहसील और SDM कोर्ट में केस जीत चुके थे लेकिन बाद में तात्कालीन अपर कलेक्टर द्वारा फैसला बदल दिया गया। मौजीलाल और श्याम रामनारायण ने भावुक होते हुए कहा कि खेत तक पहुंच न होने के कारण उपजाऊ जमीन में एक अन्न का दाना नहीं उग रहा।

न्याय के बजाय मिली धारा 151 और 170 की कार्रवाई

जनसुनवाई के दौरान जब किसानों ने अपनी बेबसी और अधिकारियों की कथित अनदेखी पर कड़ा ऐतराज जताया, तो प्रशासन ने इसे ‘अभद्रता’ का नाम दे दिया। सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर सिंह ने आरोप लगाया कि किसान मारपीट पर उतारू थे और जनसुनवाई की गरिमा भंग कर रहे थे। प्रशासन के निर्देश पर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए दोनों किसानों को धारा 151 और 170 के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

बड़ा सवाल: गरीब किसान आखिर जाए तो जाए कहां?

प्रशासन का कहना है कि मामला कोर्ट में है, इसलिए जनसुनवाई में इसका निराकरण नहीं हो सकता। लेकिन बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या सालों-साल चलने वाली अदालती प्रक्रिया के बीच एक किसान को अपने ही खेत में जाने से रोकना न्यायसंगत है? और क्या अपनी व्यथा सुनाते समय आक्रोशित होने पर किसान को सीधे जेल भेज देना ही अंतिम विकल्प था?

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