अमित पाण्डेय, खैरागढ़। जन्माष्टमी पर खैरागढ़ कृष्ण भक्ति में सराबोर है। लेकिन यहां कृष्ण भक्ति की कहानी सिर्फ आज के उत्सव तक सीमित नहीं है। शहर की गलियों और ऐतिहासिक इमारतों में भगवान श्रीकृष्ण के अलग-अलग स्वरूपों से जुड़ी सदियों पुरानी परंपराएं आज भी मौजूद हैं। कहीं ‘बनबिहारी’ के रूप में कृष्ण विराजते हैं, कहीं ‘गैंद बिहारी’ के रूप में राजपरिवार की भक्ति की कहानी सुनाते हैं, तो कमल विलास पैलेस के द्वार पर ‘फतह बिहारी’ खैरागढ़ की राजसी विरासत से जुड़ते हैं। यही वजह है कि जन्माष्टमी पर यहां आस्था के साथ इतिहास भी जीवंत हो उठता है।

300 साल पुराना बनबिहारी मंदिर

खैरागढ़ के जमातपारा स्थित श्री राधा-कृष्ण बनबिहारी मंदिर को करीब 300 साल से अधिक पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार खैरागढ़ रियासत के संस्थापक प्रथम नागवंशी राजा खड़गसिंह ने अपनी कृष्ण भक्त पत्नी के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था। स्थानीय इतिहास के जानकार भागवत शरण सिंह के अनुसार, पुराने समय में खैरागढ़ खैर के जंगलों से घिरा हुआ था। इसी ‘बन’ और भगवान कृष्ण के ‘बिहारी’ स्वरूप से मंदिर का नाम ‘बनबिहारी’ पड़ा।मंदिर के पुजारी धनंजय महाराज के अनुसार यहां भगवान कृष्ण की नृत्य मुद्राओं वाली प्रतिमाएं भी हैं। मान्यता है कि श्रीकृष्ण वन में गाय चराने जाते और लौटकर गोपियों के साथ रास रचाते थे। पुराने समय में यहां साधु-संतों का जमावड़ा लगता था और मालपुए का प्रसाद बांटा जाता था। इसी परंपरा से इलाके का नाम ‘जमातपारा’ पड़ने की भी स्थानीय मान्यता है।

गैंद बिहारी और राजपरिवार की कृष्ण भक्ति

खैरागढ़ की कृष्ण भक्ति की एक और खास कड़ी है श्री गैंद बिहारी सरकार मंदिर। स्थानीय परंपरा के अनुसार महाराजा कमल नारायण सिंह देवी उपासक थे, जबकि उनकी पत्नी रानी गैंद कुंवर भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं। इसी कृष्ण भक्ति से भगवान के विग्रह को ‘गैंद बिहारी’ नाम दिए जाने की परंपरा बताई जाती है।

इस मंदिर से करीब डेढ़ सौ साल पुरानी रथयात्रा की परंपरा जुड़े होने का भी उल्लेख मिलता है। यानी खैरागढ़ में भगवान कृष्ण के ये नाम महज धार्मिक संबोधन नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे राजपरिवार, स्थानीय परंपराओं और शहर के इतिहास की कहानियां जुड़ी हुई हैं।

राजमहल के द्वार पर ‘फतह बिहारी’

खैरागढ़ की कृष्ण भक्ति की कहानी कमल विलास पैलेस तक भी पहुंचती है। पैलेस के ईशानमुखी मुख्य द्वार के पास भगवान कृष्ण के ‘फतह बिहारी’ स्वरूप की परंपरा बताई जाती है। स्थानीय राजवंशीय विवरणों के अनुसार लाल फतह सिंह खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़े थे और राजा उमराव सिंह के पिता थे। राजपरिवार से जुड़ी परंपरा के अनुसार उनके नाम पर भगवान कृष्ण के इस स्वरूप को ‘फतह बिहारी’ कहा जाता है।

कमल विलास पैलेस परिसर स्थित प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर भी लंबे समय तक आम श्रद्धालुओं की पहुंच से बाहर रहा। बाद में मंदिर की साफ-सफाई और पूजा-अर्चना के बाद इसे श्रद्धालुओं के लिए फिर खोला गया। इससे खैरागढ़ की इस ऐतिहासिक कृष्ण परंपरा को एक बार फिर लोगों के सामने आने का मौका मिला।

श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़

एक तरफ जन्माष्टमी पर बनबिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है, तो दूसरी तरफ इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण का सवाल भी खड़ा है। मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक, मंदिर की करीब 3 से 4 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण के कारण परिसर काफी सीमित हो गया है। स्थानीय लोगों की मांग है कि मंदिर की जमीन सुरक्षित की जाए, प्राचीन संरचना का संरक्षण हो और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में डोम का निर्माण कराया जाए।

खैरागढ़ में कृष्ण भक्ति की यह विरासत इसलिए खास है, क्योंकि यहां भगवान कृष्ण सिर्फ मंदिरों में पूजे नहीं जाते, बल्कि उनके अलग-अलग स्वरूपों में खैरागढ़ की सामाजिक, धार्मिक और रियासतकालीन कहानी भी दिखाई देती है। जन्माष्टमी का उत्सव हर साल आता है, लेकिन इन धरोहरों का इतिहास सदियों पुराना है। अब जरूरत है कि आस्था से जुड़ी इन ऐतिहासिक निशानियों को सिर्फ मान्यताओं में नहीं, बल्कि संरक्षण के जरिए आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रखा जाए।

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