ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने देश में राष्ट्रीय पहचान और नस्ल को लेकर चल रही बहस पर अपनी चिंता जाहिर की है. उन्होंने अपनी दोहरी पहचान के बारे में भी बात की. उन्होंने कहा कि त्वचा का रंग राष्ट्रीयता तय नहीं करता, और वे अंग्रेज व हिंदू दोनों हैं. उन्होंने देश की नागरिकता हासिल करने के लिए स्कीन के कलर को आधार बनाने और इसका टेस्ट करने को लेकर लेकर चेतावनी दी है. 

यूके के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने एक बार फिर रेसिज्म पर बहस छेड़ दी है. सुनक ने यह बात द संडे टाइम्स में लिखे अपने लेख के माध्यम से कही.

ऋषि सुनक ने त्वचा के रंग के आधार पर ब्रिटिशता को परिभाषित करने के खिलाफ चेतावनी दी है. सुनक ने अपने कॉलम में लिखा है कि मुझे चिंता है कि ब्रिटेन की महान लोकतांत्रिक उपलब्धि दबाव में आ रही है. उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की ब्रिटिश या इंग्लिश पहचान को उसकी त्वचा के रंग से जोड़ना सही नहीं है.

उन्होंने ‘टेबिट टेस्ट’ का भी जिक्र किया. इसे अप्रैल 1990 में टोरी सांसद नॉर्मन टेबिट ने शुरू किया था. उनका मानना था कि अगर प्रवासी इंग्लैड की क्रिकेट टीम की बजाय अपने मूल देश का समर्थन करते हैं, तो यह ब्रिटिश समाज में घुलने मिलने की कमी का प्रतीक है.

सुनक ने अपने लेख में कहा कि ब्रिटेन ने एक बहु-धार्मिक और बहु-जातीय लोकतंत्र का निर्माण किया है, लेकिन यह उपलब्धि दबाव में आ सकती है. उन्होंने आव्रजन और एकीकरण से जुड़ी चुनौतियों के साथ-साथ त्वचा के रंग को राष्ट्रीयता से जोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई. उन्होंने आगे कहा कि हाल के वर्षों में सरकार में हम लोगों की इमिग्रेशन को ठीक से नियंत्रित करने में असफलता से पैदा हुई चुनौतियां का भी सामना करना होगा. हाल ही में आए लोगों को कभी भी उतने ही ब्रिटिश न मानें जितने कि वे लोग जो 1707 से यहां रह रहे हैं.

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