कुमार इंदर, जबलपुर। मध्यप्रदेश में सरकारी वकीलों की नियुक्ति के मामले में राज्य सरकार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। हाईकोर्ट में आज हुई सुनवाई के दौरान सरकार एक बार फिर अपना जवाब पेश नहीं कर पाई। इस पर सख्त रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता कार्यालय और शासन को जवाब दाखिल करने की अंतिम मोहलत दे दी है। जबलपुर हाईकोर्ट में आज सरकारी वकीलों की नियुक्ति को लेकर लगी याचिका पर अहम सुनवाई हुई। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी सरकार की तरफ से कोर्ट में कोई जवाब पेश नहीं किया जा सका।

अगली सुनवाई 19 जून को

बता दें कि यह कोई पहली बार नहीं है; इससे पहले भी हुई सुनवाइयों में हाईकोर्ट तीन बार जवाब मांग चुका है, लेकिन शासन की तरफ से चुप्पी साधी गई। अब कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह आखिरी मौका है, और मामले की अगली सुनवाई 19 जून को तय कर दी गई है।

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हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव की याचिका

दरअसल, यह पूरा विवाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव योगेश सोनी की याचिका के बाद गर्माया है। याचिका में बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता का साफ कहना है कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह से मनमानी और पक्षपात पूर्ण रही है। ​नियमों के मुताबिक, किसी भी सरकारी वकील की नियुक्ति के लिए कम से कम 10 साल की वकालत (प्रैक्टिस) होना अनिवार्य है। लेकिन आरोप है कि महाधिवक्ता कार्यालय में जिन 157 सरकारी लॉ ऑफिसर्स की फौज खड़ी की गई है, उनमें से कई वकीलों के पास 10 साल का अनुभव है ही नहीं। यानी अपात्र लोगों को उपकृत कर दिया गया।

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अब गेंद सरकार के पाले में

​बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को यह भी बताया कि पूर्व में जारी किए गए नोटिसों की तामीली तक नहीं होने दी गई। महाधिवक्ता कार्यालय और तमाम लॉ ऑफिसर्स ने नोटिस लेने से ही इनकार कर दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने बेहद संजीदगी से लेते हुए अपने रिकॉर्ड में दर्ज किया था। अब गेंद सरकार और महाधिवक्ता कार्यालय के पाले में है। तीन बार के इंतजार के बाद कोर्ट ने इस बार ‘अंतिम मोहलत’ दी है। देखना दिलचस्प होगा कि 19 जून को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार इन 157 नियुक्तियों पर क्या सफाई पेश करती है या फिर कोर्ट का हंटर चलना तय है।

दिनेश उपाध्याय, याचिकाकर्ता के वकील

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