पंडरिया से लौटकर वैभव बेमेतरिहा की रिपोर्ट

आधुनिकता के इस दौर में भी आदिम सभ्यता और संस्कृति के साथ प्रकृति के बीच गुजर-बसर करने वाली एक विशेष पिछड़ी जनजाति है बैगा. एक ऐसी जनजाति जो शहर से दूर जंगल के अंदर पहाड़ों में ही रहना पसंद करती है. एक ऐसी जनजाति जिनके बीच पहुंचने के लिए जंगल से होकर ही जाना पड़ता है. और शायद यही वजह है कि आजाद भारत में अमृतकाल वर्ष और छत्तीसगढ़ राज्य के रजत वर्ष में भी बैगाओं तक वो शासन नहीं पहुंचा जिसे सुशासन कहा जा सके.

पंडरिया विधानसभा क्षेत्र में बैगाओं की बस्तियों से ग्राउंड रिपोर्ट की शुरुआत कांदावानी वन परिक्षेत्र में धुरसी गांव से होती है. धुरसी तक पहुंचने के लिए पंडरिया मुखालय पहुंचने के बाद मैं अपनी टीम के साथ बाइक पर निकलता हूं. पंडरिया से कुई-कुकदूर होते हुए नेउर और उसके आगे कुछ किलोमीटर तक जाने के बाद पक्की सड़क समाप्त हो जाती है. नेउर के आगे इस दौरान कई जगहों पर सड़कें खराब मिलती, लेकिन उबड़-खाबड़ रास्तें में मेरा सफर जारी रहता.

धुरसी जाने के लिए मोड़ पर कच्ची सड़क आती है. गांववालों से पता चला कि सड़क निर्माण का कार्य एक साल से बंद है. पंडरिया से करीब 2 घंटे तक का सफर तय कर मैं अपनी टीम के साथ धुरसी गांव पहुंचने में सफल होता हूं. धुरसी पंडरिया विधानसभा क्षेत्र में मध्यप्रदेश सीमा पर अंतिम गांव है.
धुरसी गांव में पहुंचने पर एक बड़ी से पानी टंकी दिखाई पड़ती है. प्राथमिक शाला और आंगनबाड़ी केंद्र दिखाई देता है. गांव के अंदर कुछ सौ मीटर का सीसी रोड मिलता है. और अपनी रोजमर्रा के काम में जुटे कुछ लोग मिलते हैं. धुरसी के ग्रामीणों ने बताया कि गांव में पानी का भीषण संकट है. पानी टंकी है, लेकिन पानी नहीं है. आंगनबाड़ी केंद्र जर्जर है. प्राथमिक शाला में शिक्षा भगवान भरोसे है. बिजली कभी भी चली जाती है. पीने का पानी पहाड़ की तराई पर जाकर झरिया से लाना पड़ता है.

धुरसी के आगे पहाड़ और नदी के रास्ते हम पटपरिया, बीजाटोला होते हुए ठेंगाटोला पहुंचे. इन गांवों की कहानी भी धुरसी की तरह है. ठेंगाटोला के बैगाओं ने बताया कि गांव के करीब पहाड़ी के नीचे हॉफ नदी बहती है. गर्मी के दिनों में नदीं सूख जाती है. कहीं-कहीं पर पतली धार बहती है. वहीं से काँवर में ढोकर पानी लाते हैं. ग्रामीणों ने बताया कि पीएम आवास आया है, लेकिन पानी के अभाव में काम रुका है. आवासा निर्माण में भी दम नहीं रहता है.

कांदावानी गांव पहुंचने पर 16-17 साल के तीन-चार युवा जंगल की ओर जाते मिले. कांदावानी तक पहुंचने का एक रास्ता पक्की है. और एक रास्ता कच्ची है. पक्की रास्ता भी पूरी तरह पक्की नहीं, क्योंकि ज्यादातर हिस्सा खराब है, जबकि कच्ची सड़क पथरीली है. गांव के अंदर स्कूल भवन, पंचायत भवन दिखाई देता है. लेकिन भवन की स्थिति वैसी नहीं जिसे देखकर कहा जा सके कि अच्छी है. बस्ती में ज्यादातर घर कच्ची ही दिखाई पड़ते हैं. गांव में पानी टंकी है, लेकिन सप्लाई नहीं. कुछ घरों में नल कनेक्शन है, लेकिन वहां भी पानी नहीं है. एक हैंडपंप था, जो चालू अवस्था में मिला.
इसी तरह से नवाटोला, बिरहुलडीह, कुंडापानी, सौरू, रुखमीदादर जैसे कई बैगा बस्तियां हैं, जहां सरकार की योजनाएँ दम तोड़ देती हैं. इन गाँवों तक सुशासन की पहुँच दूर है. स्थानीय आदिवासियों के सामने गर्मी के दिनों में सबसे बड़ी समस्या पानी की होती है. पानी है तो जिंदगानी है और उसके बाद की बाकी कहानी है. जैसे- खेती-किसानी, वनोपज से जीविका और रोजगार की तलाश.

ग्रामीणों से पता चला कि कई बस्तियों में सड़क का निर्माण साल बर से बंद है. कुछ गाँवों में सड़क निर्माण के लिए पहाड़ को काटा गया है. कच्ची सड़क बनाई गई है. लेकिन उसके बाद कार्य अवरोधित है. हॉफ नदी पर कहीं-कहीं पर छोटे-बड़े पुल का निर्माण किया गया है. लेकिन सड़क का काम ठप पड़ा है.
इन गांवों का दौरा करते हुए मैंने देखा कि कई स्थानों में बैगा सिर्फ महुआ से दारू बनाते ही दिखाई दिए. बजारों में महुआ बेचना ही गर्मी में स्व-रोजगार है. कुछ एक स्थानों पर परिवार सहित मछली पकड़ते और कहीं-कहीं कुछ ऐसे भी परिवारवालेें मिले जो पानी की बूँद-बूँद निकालने पहाड़ों पर चढ़-उतर रहे थे. नदी में गड्ढा खोद रहे थे, पेड़ों की जड़ से रिसते हुए पानी को भर रहे थे.
मैंने इस दौरान यह भी देखा है कि बैगा बस्तियों में कहीं-कहीं पीएम आवास का निर्माण भी हुआ है, लेकिन निर्माण की गुणवत्ता अच्छी नहीं है. कई घरों में आवास का काम रुका हुआ है. कुछ बस्तियों में सोलर लगा है, लेकिन सोलर खराब पड़ा है. बिजली कई-कई दिनों तक गाँव में रहती ही नहीं.
अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, रोजागर, साफ पेयजल, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं को तरसे बैगा
बैगाओं ने बताया है कि स्थानीय विधायक अंतिम छोर के गांवों तक सिर्फ एक बार आई हैं. उसके बाद न तो नेता आए और न ही अधिकारी. गांवों में सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन सही ढंग से हो रहा या नहीं यह देखने वाला कोई नहीं है. बावजूद इसके अनगिनत अभावओं और समस्याओं के बीच भी बैगा अपनी दुनिया में संतोष के साथ जी रहे हैं.
वें अपने अधिकारों के लिए न शिकायत करते हैं और न आंदोलन. उन्हें बस यही भरोसा है कि समय के साथ सब अच्छा होगा. लेकिन यह समय बीतते-बीतते राज्य का रजत वर्ष और देश में अमृतकाल वर्ष को भी पार कर चुका है. बावजूद इसके बैगा बस्तियों में न चांदी की चमक है और उनके हिस्से अमृतकाल जैसा जीवन है. वे तो बस अपने गाँवों में सुशासन आने का इंतजार कर रहे हैं.
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