वीरेंद्र गहवई, बिलासपुर। हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत डाक्टरों की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि केवल किसी नाबालिग की सोनोग्राफी करने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि डाॅक्टर को यौन अपराध की जानकारी थी। जब तक यह साबित न हो कि चिकित्सक को अपराध का ज्ञान था, तब तक उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट का मामला नहीं बनता।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद राजनांदगांव की रेडियोलाजिस्ट डाॅ. आरती उइके को अपराध की सूचना पुलिस को न देने के आधार पर दायर पूरक चार्जशीट और विशेष अदालत डोंगरगढ़ द्वारा 11 मार्च 2026 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया।

ये है पूरा मामला
दरअसल राजनांदगांव के बोरतलाव थाना क्षेत्र में 15 वर्षीय किशोरी के आठ माह की गर्भवती होने का मामला सामने आने पर मुख्य आरोपी युवक के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया गया था। जांच के दौरान पुलिस ने सोनोग्राफी करने वाली रेडियोलाजिस्ट डाॅ. आरती उइके को भी इस आधार पर आरोपी बना लिया कि उन्होंने मामले की सूचना पुलिस को नहीं दी। डाॅ. उइके की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि उन्होंने पीसी-पीएनडीटी एक्ट के सभी वैधानिक प्रावधानों का पालन किया था और रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि उन्हें किसी यौन अपराध की जानकारी थी।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा-19 के तहत सूचना देने का दायित्व तभी उत्पन्न होता है, जब संबंधित व्यक्ति को अपराध की वास्तविक जानकारी या उचित आशंका हो। केवल सोनोग्राफी करने या गर्भावस्था का पता चलने से यह नहीं माना जा सकता कि डाॅक्टर को यह भी पता था कि गर्भावस्था किसी यौन अपराध का परिणाम है।
यौन शोषण के आरोपी पर जारी रहेगी कार्रवाई
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनने पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। हाईकोर्ट ने डाॅ. आरती के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाते हुए स्पष्ट किया कि इस आदेश से मुख्य आरोपी को कोई राहत नहीं मिलेगी। यौन शोषण के लिए उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की कार्रवाई जारी रहेगी।
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