कुमार इंदर, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान संवेदनशीलता की एक अनूठी मिसाल पेश की है। कोर्ट ने रेलवे की एक खारिज हो चुकी याचिका को बहाल (मंजूर) करने के लिए एक बेहद अनोखी और मानवीय शर्त रखी है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि रेलवे के संबंधित अधिकारी और उनके अधिवक्ता जबलपुर के एक नेत्रहीन विद्यालय में जाकर बच्चों के साथ समय बिताएं, तभी उनकी याचिका पर आगे विचार किया जाएगा।

क्या है हाईकोर्ट की अनोखी शर्त?

मामले से जुड़े आवेदक, रेलवे के संबंधित अधिकारी और उनके अधिवक्ता को जबलपुर के अंधमूक बाईपास के पास स्थित नेत्रहीन विद्यालय जाना होगा और वहां बच्चों के साथ कम से कम एक घंटा बिताना होगा। अधिकारियों को खाली हाथ नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए ढाई हजार (2500) रुपये का नाश्ता लेकर जाना होगा। क्यों आई ऐसी शर्त की नौबत?

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दरअसल, रेलवे से जुड़े एक मामले में एक मिसलेनियस (विविध) याचिका कोर्ट द्वारा खारिज हो गई थी। इसी खारिज याचिका को दोबारा बहाल कराने के लिए रेलवे के अधिकारी और उनके वकील हाई कोर्ट पहुंचे थे। कोर्ट ने याचिका मंजूर करने की कानूनी प्रक्रिया के बीच यह मानवीय शर्त सामने रख दी।

कोर्ट की मर्मस्पर्शी टिप्पणी, मिलेगी आत्मिक संतुष्टि

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बेहद भावुक और विचारणीय टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा—”दृष्टिबाधित बच्चों के साथ एक घंटा बिताने से न केवल अधिवक्ताओं और अधिकारियों को आत्मिक संतुष्टि मिलेगी, बल्कि उन बच्चों के मन में भी समाज और कानून के प्रति एक नया भरोसा पैदा होगा। हाईकोर्ट का यह फैसला कानून के उस मानवीय चेहरे को दिखाता है, जो सजा या जुर्माने से परे समाज में संवेदनशीलता जगाने का प्रयास करता है। अब रेलवे के अफसरों और वकीलों द्वारा इस शर्त को पूरा करने के बाद ही कोर्ट याचिका को आधिकारिक रूप से मंजूर करेगा।

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