पटना। हाल ही में आयकर विभाग ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के दुरुपयोग से जुड़ा एक बड़ा वित्तीय घोटाला उजागर किया है। जांच के दायरे में गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल आए हैं, जिनका उपयोग कथित तौर पर टैक्स चोरी के एक सोचे-समझे तंत्र के रूप में किया जा रहा था।
घोटाले का कार्यप्रणाली
जांच से पता चला है कि यह पूरा खेल दान के नाम पर खेला जा रहा था। दानदाता सबसे पहले किसी गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के बैंक खाते में बड़ी राशि जमा करते थे। इसके बाद, बिचौलियों और विभिन्न अन्य खातों के माध्यम से उस राशि का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा नकद या अन्य माध्यमों से वापस दानदाता को लौटा दिया जाता था। इस प्रक्रिया में केवल 10 प्रतिशत हिस्सा कमीशन के तौर पर राजनीतिक दल या बिचौलियों के पास रहता था।
टैक्स चोरी का गणित
यह पूरा तंत्र दानदाताओं को भारी कर लाभ दिलाने के लिए बनाया गया था। आयकर अधिनियम की धारा 80GGC के तहत राजनीतिक दलों को दिए गए चंदे पर आयकर में छूट का प्रावधान है। दानदाता चंदा देने के बाद शेष बची हुई 90 प्रतिशत राशि वापस पाकर अपनी काली कमाई को सफेद करने में सफल हो जाते थे और साथ ही पूरी राशि पर टैक्स छूट का अनुचित लाभ भी उठा लेते थे। इससे सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हुआ है।
6,000 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन पर नजर
आयकर विभाग की जांच का दायरा लगभग 6,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। विभाग की रडार पर बिहार में पंजीकृत दो गैर-मान्यता प्राप्त दल विशेष रूप से हैं। हाल ही में दिल्ली, सूरत और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों में व्यापक छापेमारी की गई है, जिससे इस रैकेट से जुड़े कई अहम साक्ष्य मिले हैं।
जांच का आधार
सूत्रों के अनुसार यह जांच लगभग 18 महीने पहले शुरू की गई थी। विभाग को टैक्स रिफंड और वास्तविक कर संग्रह के आंकड़ों में असामान्य विसंगतियां मिली थीं, जिसके बाद इस मनी लॉन्ड्रिंग जैसे नेटवर्क का खुलासा हुआ। फिलहाल, आयकर विभाग इस पूरे नेटवर्क में शामिल अन्य कंपनियों, संस्थाओं और बिचौलियों की भूमिका को खंगाल रहा है। जांच पूरी होने के बाद, दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। यह मामला देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं और वित्तीय प्रणाली की शुचिता के लिए एक बड़ा सबक है।

