India-Myanmar Border Dispute: भारत-म्यांमार सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सीमा विवाद सुलझाने के लिए भारत-म्यांमार जमीन की अदला-बदली करेंगे। वर्षों से लंबित सीमा सीमांकन का मामला सुलझाने की दिशा में बातचीत शुरू भी हो गई है। हालांकि इस प्रस्ताव ने मणिपुर में राजनीतिक और सामाजिक विरोध की आहट पैदा कर दी है। जमीन की अदला-बदली की लेकर मणिपुर में विरोध की चिंगारी सुलगने लगी है। पहले ही 2 साल से अधिक दिनों से हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर के लिए यह फैसला आग में घी डालने का काम कर सकती है और स्थिति विध्वंसक हो सकती है।

दरअसल भारत-म्यांमार सीमा विवाद पर 4 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि सीमा पर कुछ ऐसे इलाके हैं जिन्हें अभी सुलझाया जाना बाकी है. उन हिस्सों पर बातचीत चल रही है। हालांकि उन्होंने इन खबरों की पुष्टि नहीं की कि दोनों देशों के बीच जमीन की अदला-बदली हो सकती है।

वहीं प्रस्तावित योजना का मणिपुर में पहले ही विरोध शुरू हो गया है। ‘कोऑर्डिनेटिंग कमिटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ (COCOMI) ने भारत सरकार को चेतावनी दी है कि वह राज्य के इलाके का एक छोटा सा हिस्सा भी म्यांमार को न सौंपे। संगठन ने कहा कि अगर ऐसा कोई प्रस्ताव लागू किया जाता है, तो वे इसके खिलाफ जबरदस्त जन-विरोध करेंगे। संगठन ने आगे चेतावनी दी कि नई दिल्ली को मणिपुर के लोगों की सहमति के बिना उसकी क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित करने वाला कोई भी फैसला लेकर ‘आग से नहीं खेलना’ चाहिए। COCOMI संगठनन ने तर्क दिया कि 1949 में भारतीय संघ में विलय के बाद से मणिपुर ने अपने ऐतिहासिक इलाके के कुछ हिस्से पहले ही खो दिए हैं। चेतावनी दी कि राज्य की भौगोलिक सीमाओं में और कोई भी कटौती मंज़ूर नहीं होगी, जैसा कि ‘द इम्फाल टाइम्स’ ने रिपोर्ट किया। मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को ऐसा मुद्दा बताते हुए जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता, संगठन ने कहा कि राज्य की मौजूदा सीमाएँ पिछली पीढ़ियों से विरासत में मिली हैं और समय-समय पर उनकी रक्षा की गई है।

भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा

बता दें कि भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है और फिर म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र और चिन राज्य में जाती है। सीमा का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी, जंगली और खुला है, जो उन जातीय समुदायों के इलाकों से होकर गुजरता है जो दोनों तरफ रहते आए हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार, सीमा के लगभग 1,472 किलोमीटर हिस्से को बॉर्डर पिलर के जरिए तय किया गया है, जबकि लगभग 171 किलोमीटर हिस्सा अभी भी अनसुलझा है। यह मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश के लोहित सेक्टर और मणिपुर की काबाव घाटी में है।

अमेरिकी मैगज़ीन ‘द डिप्लोमैट’ ने किया है दावा

बता दें कि यह दावा अमेरिका की मैगज़ीन ‘द डिप्लोमैट’ (The Diplomat) ने की है। अमेरिकी मैगज़ीन की रिपोर्ट के मुताबिक अदला-बदली के लिए प्रस्तावित इलाका मणिपुर के चंदेल जिले में है, जो म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र में काबाव घाटी से सटा हुआ है। 17 जुलाई की रिपोर्ट में मैगजीन ने कहा कि भारत सरकार म्यांमार के साथ मणिपुर की सीमा पर बॉर्डर पिलर 65 और 68 के बीच सीमा तय करने के लिए लगभग 1.4 वर्ग मील जमीन की अदला-बदली के ‘प्रस्ताव’ की जांच कर रही है. पिलर 65 और 68 के बीच की दूरी लगभग 2.8 किलोमीटर है। सीमा तय करने का काम तीन महीने के भीतर, यानी अगस्त के आसपास पूरा होने की उम्मीद थी। मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन की अदला-बदली के संभावित प्रस्ताव के पीछे मुख्य मकसद भारत-म्यांमार सीमा के अनसुलझे हिस्से को तय करने की प्रक्रिया में तेजी लाना है। जिससे नई दिल्ली सीमा पर बाड़ लगा सके और अवैध आप्रवासन, उग्रवादियों की आवाजाही और सीमा पार होने वाले अन्य अपराधों को रोका जा सके।

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