हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्य प्रदेश का इंदौर जिसे साफ-सफाई और व्यवस्थाओं के लिए पूरे देश में नंबर वन बताया जाता है। उसी इंदौर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सिस्टम के दावों की पूरी पोल खोल रही है। 42 डिग्री की झुलसा देने वाली गर्मी, आसमान से बरसती आग और उसी आग में खुले मैदान में गौमाता खड़ी हैं। न सिर पर छांव, न पास में पानी, बस तपती जमीन और लाचार खड़ी गायें। लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा और भी चौंकाने वाला है, जहां गायों को छांव नहीं मिली, वहीं ट्रैक्टर आराम से टिन शेड के नीचे खड़े नजर आए और कंडे भी बढ़िया तरीके से शेड में सुरक्षित रखे गए। यानी मशीनों को प्राथमिकता और गौमाता को नजरअंदाज ?
यह पूरा मामला नगर निगम की ओर से संचालित रेशम केंद्र गौशाला का है। जहां शहरभर से पकड़ी गई और छोड़ी गई गायों को रखा जाता है। अब जरा हिसाब समझिए… मध्य प्रदेश सरकार हर एक गाय पर रोजाना करीब 40 रुपए खर्च करती है। यह पैसा सीधे डीबीटी के जरिए गौशालाओं तक पहुंचता है। इसके अलावा गौसेवक और दानदाता भी लगातार आर्थिक मदद करते हैं। तो फिर सवाल सीधा है- पैसा जा कहां रहा है?
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जब lalluram.com की टीम मौके पर पहुंची, तो जमीनी हकीकत ने सिस्टम की परतें खोल दीं। कई बाड़ों में न पीने का पानी था, न खाने के लिए घास। भीषण गर्मी में गायें बेहाल खड़ी थीं, मानो किसी को उनकी चिंता ही नहीं। सबसे हैरानी की बात- गौशाला में डॉक्टर की ड्यूटी तय है, लेकिन मौके पर कोई पशु चिकित्सक मौजूद नहीं मिला। यानी इलाज का इंतजाम भी सिर्फ कागजों में?
अब सवाल और भी गंभीर हो जाते हैं
क्या गौशाला सिर्फ फंड लेने का जरिया बन गई है? क्या जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदकर बैठे हैं? क्या यहां बड़े स्तर पर गड़बड़ी या घोटाले का खेल चल रहा है? क्योंकि जब सरकार पैसा दे रही है, समाज सहयोग कर रहा है तो फिर गायों को मूलभूत सुविधाएं क्यों नहीं मिल रहीं? जब इस पूरे मामले में जानकारी के लिए निगम आयुक्त को फोन किया गया तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।

गौ संचालकों सेवकों आरोप
जब गाय को इलाज के लिए गौशाला ले जाया जाता है तो वहां ट्राली से नीचे उतरने के पहले इलाज करने से मना कर दिया जाता है और गाय का इलाज नहीं हो पाता और अगर दबाव प्रभाव से गाय को इलाज के लिए ले लिया जाता है तो कुछ देर बाद गाय की मौत हो जाती है पिछली बार रेशम के अंदर गौशाला के वीडियो सामने आए थे जिसमें गौशाला की देखरेख करने वाले महाराज ने बताया था कि यहां रोज 8 से 10 गाय की मौत होती है तब साथी गौ सेवकों ने आरोप लगाया है कि डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं रहते हैं जिसके कारण कई परेशानी आती है और शेड लगाने के लिए पिछली बार भी सरकार ने फंड जारी किया था एक शेड बनकर तैयार हुआ लेकिन बाकी के शेर अभी तक नहीं बन सके।
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यह सिर्फ लापरवाही नहीं यह व्यवस्था पर सीधा सवाल है। अब निगाहें नगर निगम पर हैं। क्या इस मामले में जांच होगी? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह पूरा मामला भी फाइलों में दबकर ठंडा पड़ जाएगा? इंदौर की यह “अजब-गजब” तस्वीर अब जवाब मांग रही है और जवाब देना सिस्टम की जिम्मेदारी है।

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