कुमार इंदर, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छतरपुर फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पति की ओर से पत्नी के कथित अवैध संबंधों को लेकर पर्याप्त सबूत पेश किए गए हैं, तो अदालत उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में अंतिम फैसला लेने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों की गहनता से जांच और अध्ययन जरूरी है। मामला छतरपुर फैमिली कोर्ट से जुड़ा है, जहां वर्ष 2018 में पत्नी को पति से हर महीने 6 हजार रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था। इस आदेश के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
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याचिकाकर्ता पति दिल्ली का निवासी है, जबकि उसकी शादी छतरपुर निवासी महिला से हुई थी। पति ने हाई कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया कि उसकी पत्नी के कई लोगों से अवैध संबंध हैं। अपने आरोपों के समर्थन में उसने सीडी, ट्रांसक्रिप्शन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी फैमिली कोर्ट के सामने पेश किए थे।
पति का आरोप था कि फैमिली कोर्ट ने उसके द्वारा पेश किए गए इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया और उन्हें नजरअंदाज करते हुए पत्नी के पक्ष में भरण-पोषण का आदेश पारित कर दिया। मामले की सुनवाई जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की बेंच ने की। हाई कोर्ट ने माना कि मामले में पेश किए गए साक्ष्यों की उचित जांच और मूल्यांकन आवश्यक है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए निचली अदालत में भेज दिया।
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हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण से जुड़े मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों को नजरअंदाज करके फैसला नहीं किया जा सकता। खासतौर पर जब पति की ओर से पत्नी के आचरण को लेकर दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश किए गए हों, तो अदालत को उनकी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता का गहन परीक्षण करना चाहिए। अब फैमिली कोर्ट को उपलब्ध साक्ष्यों का दोबारा परीक्षण करते हुए मामले में नए सिरे से फैसला करना होगा।
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