Jodhpur Nagar Nigam Election: राजस्थान के दूसरे बड़े शहर जोधपुर में आगामी नगर निगम चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प होने वाला है। परिसीमन के बाद जोधपुर में अब दो की जगह एक नगर निगम का गठन हुआ है और कुल 100 वार्डों के लिए सोमवार 17 अगस्त को आरक्षण लॉटरी निकाली गई।

लॉटरी के बाद उन नेताओं की उम्मीदों को झटका लगा है, जो महापौर पद की दौड़ में शामिल होने की तैयारी कर रहे थे। वार्ड आरक्षित होने के कारण कई संभावित दावेदार अब पार्षद का चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे।
100 वार्डों में आरक्षण का पूरा गणित
जोधपुर नगर निगम के 100 वार्डों में से 65 वार्ड सामान्य वर्ग के लिए रखे गए हैं। वहीं 13 वार्ड अनुसूचित जाति, 2 वार्ड अनुसूचित जनजाति और 20 वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित किए गए हैं। आरक्षण के तहत महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है। सामान्य वर्ग की सीटों में 22 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित बताए गए हैं। अनुसूचित जाति की 13 सीटों में 4 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। अनुसूचित जनजाति के लिए 2 में से 1 वार्ड महिला के लिए और ओबीसी वर्ग की 20 सीटों में 7 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। आरक्षण की स्थिति सामने आने के बाद अब कई नेताओं को अपने राजनीतिक समीकरण बदलने पड़ सकते हैं।
पहले दो निगम, अब एक नगर निगम
जोधपुर में पहले दो नगर निगम हुआ करते थे। इनमें एक पर बीजेपी और दूसरे पर कांग्रेस का बोर्ड था। परिसीमन के बाद दोनों नगर निगमों को मिलाकर अब एक नगर निगम बनाया गया है। एक ही नगर निगम बनने के बाद महापौर पद को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में मुकाबला पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में वार्ड आरक्षण ने कई संभावित उम्मीदवारों की तैयारियों पर असर डाल दिया है।
गहलोत और शेखावत के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल
जोधपुर का नगर निगम चुनाव राजनीतिक रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह जिला है। वहीं केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के लिए भी जोधपुर महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र है। दोनों नेताओं के बीच कई मौकों पर राजनीतिक बयानबाजी और कटाक्ष देखने को मिले हैं। अब एक नगर निगम बनने के बाद इस चुनाव को दोनों नेताओं के लिए भी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है।
मेयर की कुर्सी पर किसका कब्जा होगा?
एक नगर निगम बनने के बाद जोधपुर में महापौर का चुनाव दोनों प्रमुख दलों के लिए अहम होगा। हालांकि, वार्डों की आरक्षण स्थिति सामने आने के बाद संभावित दावेदारों के समीकरण बदल गए हैं। जिन नेताओं के वार्ड आरक्षित श्रेणी में चले गए हैं और वे उस श्रेणी के लिए पात्र नहीं हैं, उनके लिए पार्षद चुनाव लड़ने का रास्ता बंद हो गया है। ऐसे में अब राजनीतिक दलों को नए चेहरों और नए समीकरणों के साथ चुनावी रणनीति तैयार करनी होगी।
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