Karnataka Politics: जातिगत जनगणना (caste census) को बीजेपी के खिलाफ पॉलिटिक्स हथियार बनाने वाली कांग्रेस अब खुद अपने हाथ जलाने वाली स्थिति में पहुंच गई है। पूर्व सीएम सिद्धारमैया (Siddaramaiah) ने कर्नाटक में अपनी ही सरकार के सामने 75% आरक्षण की मांग (Siddaramaiah puts forward demand for 75% reservation) कर डाली है। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य सरकार पर दबाव डालते हुए मांग की है कि कर्नाटक की जातिगत सर्वे रिपोर्ट तुरंत लागू हो और दलितों, पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यकों का आरक्षण बढ़ाकर 75 प्रतिशत किया जाए। सिद्धारमैया के इस तेवर से कांग्रेस और कर्नाटक सीएम डीके शिवकुमार (CM DK Shivakumar) की मुश्किलें बढ़ती हुई दिख रही है।
बता दें कि सिद्धारमैया चुनावी राजनीति से संन्यास ले चुके हैं। फिर भी उनका यह कदम उत्तराधिकारी शिवकुमार की सरकार के लिए राजनीतिक बदले जैसा माना जा रहा है।
कर्नाटकके पूर्व सीएम और दिग्गज कांग्रेस नेता सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से हैं। वे अहिंडा गठबंधन का चेहरा माने जाते हैं। जबकि शिवकुमार प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से हैं। कांग्रेस के लिए यह मांग नकारना आसान नहीं, क्योंकि इससे पार्टी की राष्ट्रीय नीति पर सवाल उठेंगे। वहीं रिपोर्ट लागू करना भी आसान नहीं, क्योंकि कई ताकतवर समुदाय इससे प्रभावित होंगे। यह मांग मई में सीएम पद डीके शिवकुमार को सौंपने के बाद आई, जिससे शिवकुमार सरकार असहज स्थिति में फंस गई है।
सरकार को अपनी ही रिपोर्ट लागू करने में हिचकिचाहट
कर्नाटक में कांग्रेस को नवंबर 2025 से तैयार अपनी सर्वे रिपोर्ट लागू करने में हिचकिचाहट है। यह रिपोर्ट 2024 में पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष जयप्रकाश हेगड़े ने सिद्धारमैया को सौंपी थी। सिद्धारमैया ने 6 सितंबर को बेंगलुरु में पिछड़ा वर्ग महासंघ के रजत जयंती समारोह में कहा कि सामाजिक न्याय के लिए कम से कम 75 प्रतिशत आरक्षण जरूरी है। लोकसभा तथा विधानसभाओं में भी आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
केंद्र में अलग और राज्य में अलग राग
वहीं केंद्र में कांग्रेस का अलग ही राग है। कांग्रेस का तर्क है कि आरक्षण, प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बंटवारे का फैसला लेने से पहले हर समुदाय की सही संख्या पता होनी चाहिए। आजादी के बाद पहली बार 2027 की जनगणना में एससी-एसटी के अलावा बाकी जातियों की भी गिनती होगी। कांग्रेस का आरोप है कि जनगणना फॉर्म में ओबीसी श्रेणी न रखना एक बड़ी साजिश है, ताकि सही ओबीसी आबादी सामने न आ सके। राहुल गांधी और कांग्रेस इसे संस्थानों में भागीदारी और संसाधनों की उपलब्धता से जोड़ते रहे हैं।
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