लखनऊ के मलिहाबाद में कासमंडी किले को लेकर पासी समाज और मुस्लिम पक्ष के बीच विवाद लगातार गहराता जा रहा है. एक तरफ पासी समाज दावा कर रहा है कि कासमंडी का किला उनके पूर्वज महाराजा कंस पासी का महल है और उसके भीतर शिव मंदिर मौजूद है. वहीं, मुस्लिम समाज इस जगह को मस्जिद और मकबरा बता रहा है.
इस पूरे विवाद के बीच एक नाम तेजी से चर्चा में आया है- सूरज पासी. पासी समाज की ओर से इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे सूरज पासी खुद को केवल सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की सामाजिक चेतना का चेहरा मानते हैं. यही वजह है कि मलिहाबाद का यह विवाद अब केवल जमीन या धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसके जरिए पासी समाज के भीतर उभर रही नई सामाजिक और राजनीतिक चेतना भी सामने आ रही है.
कौन हैं सूरज पासी?
सूरज पासी का जन्म साल 1998 में लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के भोलापुर गांव में हुआ था. बेहद साधारण परिवार में जन्मे सूरज की जिंदगी में बड़ा संकट तब आया, जब महज 17 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया. परिवार की जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई. आर्थिक संघर्षों के बीच सूरज पासी ने अपने समाज के इतिहास को पढ़ना और समझना शुरू किया. उन्होंने जब पासी समाज के इतिहास को खंगाला, तो पाया कि उनके पूर्वजों का अतीत बेहद गौरवशाली रहा है. कई क्षेत्रों में पासी राजवंशों का शासन रहा, लेकिन समय के साथ ये समाज सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ता चला गया.
यही बात सूरज को सबसे ज्यादा विचलित करती रही. इसके बाद उन्होंने समाज को संगठित करने और युवाओं के भीतर पहचान और चेतना जगाने का अभियान शुरू किया. इसके लिए सूरज ने Gen Z लाखन आर्मी बनाई.
कैसे बनी लाखन आर्मी?
27 फरवरी 2023 को सूरज पासी ने ‘लाखन एकता मिशन’ की शुरुआत की. इस संगठन को ‘लाखन आर्मी’ के नाम से पहचान मिली. लाखन आर्मी मुख्य रूप से Gen Z युवाओं का सामाजिक संगठन है. इस संगठन का उद्देश्य केवल सामाजिक एकजुटता नहीं, बल्कि समाज के भीतर आत्मगौरव, शिक्षा, आर्थिक मजबूती और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना भी है. इस संगठन की सबसे बड़ी खासियत इसकी नशा मुक्ति मुहिम मानी जाती है. लाखन आर्मी से जुड़ने की पहली शर्त ही नशा मुक्त होना है. संगठन युवाओं को शराब, नशे और अपराध से दूर रहने की शपथ दिलाता है. इसी वजह से कम समय में यह संगठन युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ है.
केवल जातीय संगठन नहीं, सामाजिक मुहिम भी
लाखन आर्मी खुद को केवल पासी समाज तक सीमित संगठन के रूप में पेश नहीं करती. संगठन आदिवासी और जनजातीय समुदायों के बीच भी सक्रिय रूप से काम कर रहा है. आदिवासी युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा के प्रति जागरूक करने और सामाजिक अधिकारों को लेकर आवाज उठाने के लिए लाखन आर्मी कई इलाकों में अभियान चला रही है.
धर्मांतरण के खिलाफ भी एक्टिव
यह संगठन धर्मांतरण के मुद्दे पर भी मुखर है. लाखन आर्मी दलितों और वंचित समाज के लोगों के धर्मांतरण का विरोध करती है. संगठन अपने समाज के लोगों को “इतिहास, संस्कृति और विरासत” से जोड़ने की बात करता है और उन्हें अपने नायकों और परंपराओं के बारे में जागरूक करता है.
यूपी से बिहार और उत्तराखंड तक फैल रहा नेटवर्क
लाखन आर्मी का सबसे ज्यादा प्रभाव फिलहाल उत्तर प्रदेश में देखा जा रहा है. इस संगठन का यूपी के करीब 30 जिलों में सक्रिय नेटवर्क है. हरदोई, उन्नाव, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, गोरखपुर, आजमगढ़, शाहजहांपुर और पीलीभीत जैसे जिलों में संगठन लगातार विस्तार कर रहा है. इसके अलावा बिहार और उत्तराखंड में भी लाखन आर्मी अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है. शुरुआत में यह संगठन पूरी तरह युवाओं के बीच लोकप्रिय था, लेकिन अब मिलेनियल और बुजुर्ग वर्ग के लोग भी इससे जुड़ने लगे हैं. संगठन की नशा मुक्ति मुहिम, सामाजिक जागरूकता और इतिहास से जोड़ने की कोशिशों को समाज के बुजुर्गों का भी समर्थन मिलने लगा है.
यूपी की राजनीति में क्यों अहम है पासी समाज?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पासी समाज को बड़ा सामाजिक और चुनावी फैक्टर माना जाता है. राज्य में दलित आबादी करीब 21 फीसदी है. दलित समाज में जाटव समुदाय के बाद पासी समाज दूसरी सबसे बड़ी आबादी माना जाता है. अनुमान के मुताबिक, दलित आबादी में पासी समाज की हिस्सेदारी करीब 16 फीसदी है, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 3 से 4 फीसदी हिस्सा बनाती है. अवध और पूर्वांचल के कई जिलों जैसे अयोध्या, रायबरेली, मिर्जापुर, महाराजगंज, गोरखपुर, हरदोई, भदोही, गोंडा और प्रतापगढ़ में पासी वोटर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में माने जाते हैं. यही वजह है कि मलिहाबाद का कासमंडी विवाद अब केवल स्थानीय विवाद नहीं रह गया है. इसके जरिए पासी समाज के भीतर उभर रही नई पीढ़ी की सामाजिक और राजनीतिक लामबंदी भी साफ दिखाई देने लगी है.
क्या है कासमंडी का विवाद?
मलिहाबाद के कासमंडी में एक किला है, जिसे लेकर बवाल हो रहा है. स्थानीय पासी समुदाय का दावा है कि यह स्थल 11वीं सदी के राजा कंस (कंसा पासी) का ऐतिहासिक किला है जहां उनके आराध्य भगवान शिव का मंदिर है. उनका आरोप है कि किले में मुस्लिम समाज की ओर से अवैध मजारें बनाई जा रही हैं और नमाज पढ़ी जाती हैं. जबकि हिंदुओं को वहां जाने से रोका जाता है. पासी समाज ने इस मामले में सीएम योगी आदित्यनाथ को ज्ञापन भी सौंपा है. वहीं, मुस्लिम पक्ष का दावा है कि वह लंबे समय से यहां इबादत कर रहे हैं.

