राजधानी में एलपीजी सिलेंडर की कमी और कालाबाजारी के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गैस सप्लाई, वितरण व्यवस्था और उसकी निगरानी जैसे मुद्दे कार्यपालिका (सरकारी प्रशासन) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए इस पर न्यायपालिका सीधे तौर पर आदेश जारी नहीं कर सकती। याचिका में राजधानी में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता में कमी और कथित कालाबाजारी को लेकर चिंता जताई गई थी। हालांकि कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित सरकारी विभाग और नियामक एजेंसियों को ही कार्रवाई करनी होती है।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेदस कारिया की पीठ ने कहा कि अदालत ऐसे आदेश नहीं दे सकती जो व्यवहारिक रूप से लागू ही न हो सकें। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि अदालत यह निर्देश दे कि अब कालाबाजारी या जमाखोरी पूरी तरह खत्म हो जाए, तो यह व्यावहारिक रूप से कितना संभव है, इस पर सवाल उठता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में नीति निर्माण और क्रियान्वयन का काम कार्यपालिका का है, जबकि न्यायपालिका केवल कानून के दायरे में रहकर ही हस्तक्षेप कर सकती है।

 ‘गरीबी खत्म करने’ जैसा आदेश नहीं दे सकते

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा कि अदालत ऐसे निर्देश जारी नहीं कर सकती जो व्यवहारिक रूप से लागू ही न किए जा सकें। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार को यह आदेश देना कि दो महीने में गरीबी खत्म कर दी जाए, व्यावहारिक नहीं होगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि सरकार और तेल कंपनियों की जिम्मेदारी संसाधनों, आपूर्ति व्यवस्था और नीतिगत सीमाओं पर निर्भर करती है। ऐसे में अदालत का काम यह नहीं है कि वह असंभव या गैर-कार्यान्वयन योग्य आदेश जारी करे।

क्या कहा याचिकाकर्ता ने

कथित कालाबाजारी को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अधिवक्ता राकेश कुमार मित्तल ने कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने अदालत को बताया कि बाजार में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत लगभग 1000 रुपये के आसपास होने के बावजूद कुछ जगहों पर इसे 5000 रुपये से अधिक में बेचा जा रहा है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि कुछ समय पहले हाईकोर्ट की कैंटीन में भी गैस की कमी देखी गई थी, जो आपूर्ति व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाती है। इसके अलावा उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि देश में घरेलू मांग और कथित कमी के बावजूद एलपीजी का निर्यात जारी है, जिससे घरेलू बाजार पर असर पड़ सकता है।

अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट कैंटीन में गैस सप्लाई से जुड़ा जो मुद्दा उठा था, उसे उसी दिन बहाल कर दिया गया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक स्तर पर समस्या का समाधान किया गया। जस्टिस तेजस कारिया ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब सरकार पहले से ही स्थिति सुधारने के लिए कदम उठा रही है, तो अदालत को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। गैस निर्यात के मुद्दे पर भी कोर्ट ने साफ किया कि यह आर्थिक नीति से जुड़ा विषय है और इसमें न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती, क्योंकि यह पूरी तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

सरकार के पास जाने की सलाह

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में समाधान निकालना पूरी तरह कार्यपालिका की जिम्मेदारी है और नीति निर्माण व क्रियान्वयन का अधिकार सरकार के पास ही होता है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी नागरिक को आपूर्ति, वितरण या बाजार व्यवस्था से जुड़ी शिकायत है, तो उसका समाधान संबंधित सरकारी विभागों और प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से किया जाना चाहिए।

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