कुमार इंदर, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने जनभागीदारी समिति के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल लंबे समय तक सेवा देने के आधार पर जनभागीदारी समिति द्वारा रखे गए कर्मचारियों को स्थायी (नियमित) कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की युगल पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर रिट अपील को स्वीकार करते हुए सिंगल बेंच के पूर्व आदेश को खारिज कर दिया है।

सिंगल बेंच का आदेश खारिज, राज्य सरकार की अपील स्वीकार

यह पूरा मामला सीधी जिले के संजय गांधी शासकीय स्मृति महाविद्यालय से जुड़ा है। यहां पदस्थ चतुर्थ एवं तृतीय श्रेणी के 11 कर्मचारियों ने सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के अक्टूबर 2016 के नियमों का हवाला देते हुए खुद को नियमित करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में याचिका दायर की थी। सिंगल बेंच ने इन कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें नियमित करने के निर्देश दिए थे, जिसे राज्य सरकार ने युगल पीठ में चुनौती दी थी।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणी और 1996 का गजट नोटिफिकेशन

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 30 सितंबर 1996 के गजट नोटिफिकेशन का हवाला दिया और निम्नलिखित व्यवस्था दी।

नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं: जनभागीदारी समिति को किसी भी कर्मचारी को नियमित रूप से नियुक्त करने का कानूनी अधिकार नहीं है।

राज्य सरकार की अनुमति अनिवार्य

समिति केवल कॉलेज के तात्कालिक कार्यों के संपादन के लिए किसी व्यक्ति की सेवाएं ले सकती है, लेकिन राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना स्थायी नियुक्ति नहीं दे सकती। कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश भर के शासकीय कॉलेजों में जनभागीदारी समिति के तहत कार्यरत हजारों कर्मचारियों के नियमितीकरण की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है, वहीं सरकार की नीतियों को कानूनी वैधता मिली है।

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